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Wednesday, 25 December 2019

झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


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झारखंड निर्माण के 19 वर्ष बित चुके हैं, इन 19 वर्षों में झारखण्ड ने 10 मुख्यमंत्री देखे हैं। इनमें से केवल रघुवर दास हीं अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा कर पाएं हैं, इन 19 सालों में 13 साल तक झारखंड में भाजपा ने शासन किया है। फिर भी झारखण्ड की बदहाली की बात जब आती है तो भाजपा के नेता, कांग्रेस और झामुमो को जिम्मेदार बता देते हैं। 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव बीजेपी बुरी तरह से हार गई। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान रघुवर दास पूर्ण विश्वास दिखाते रहे और कहते रहे कि अबकी बार 65 पार, चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री का दावा जुमला साबित हुआ और झारखंड में बीजेपी 65 से आधी सीटें भी नहीं ला पाई, इन चुनावों में बीजेपी को सिर्फ 25 सीटें मिलीं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने में हुवे उलटफेर से बीजेपी कोई रिस्क लिए बिना सतर्क होकर चल रही थी लेकिन उनका ये दाँव काम न आया। झामुमो, कांग्रेस तथा राजद गठबन्धन को मिले स्पष्ट जनादेश के बाद नई सरकार बनाने के लिए तैयार है।   
        इस हार के कई कारण हैं, कुछ प्रमुख कारण जिसके कारण बीजेपी झारखण्ड में चुनाव हार गई...


बिना सहयोगियों के चुनाव लड़ना


झारखण्ड निर्माण के बाद से हीं चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव बीजेपी और आजसू  मिलकर चुनाव लड़ते आई है। लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर हुवे खींचतान के कारण सम्भवतः इस बार बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। कुछ लोग आजसू द्वारा अधिक सीटें मांगे जाने की बात भी करते है।
      झारखंड विधानसभा चुनाव में आजसू ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 2 सीटें जीती है, मतलब साथ में चुनाव लड़ते तो 27 सीटें जरूर जीतते इसके अतिरिक्त बड़कागांव, जामा, चक्रधरपुर, नाला, मधुपुर, डूमरी, घाटसिला, जुगसलई, इचागढ़, गांडेय, खिजरी, लोहरदगा और रामगढ़ ये वो तेरह विधानसभा क्षेत्र हैं जहाँ आजसू और बीजेपी के वोट जोड़ दें तो भाजपा गठबंधन की जीत हो सकती थी।
      वहीं, केंद्र में भाजपा के साथ गठबंधन में सहयोगी लोकजन शक्ति पार्टी ने भी करीब 50 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा, इससे वोटों का बंटवारा हुआ, कई सीटों पर आजसू और एलजेपी ने बीजेपी के वोट काटे। इस तरह बीजेपी का अपने सहयोगियों से अलग होकर चुनाव लड़ना गलत फैसला साबित हुवा।


गैर आदिवासी मुख्यमंत्री और आदिवासियों की नाराजगी


झारखंड निर्माण के 14 साल बाद 2014 में पहली बार  रघुवर दास झारखंड के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने, उस झारखंड में जहां राज्य की कुल आबादी के एक चौथाई से अधिक आदिवासियों की आबादी है और 81 में से 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। भाजपा सरकार में पहले मुख्यमंत्री रह चुके आदिवासी समुदाय से आने वाले अर्जुन मुंडा को नजरअंदाज कर गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनाये जाने के कारण आदिवासियों में भाजपा की छवि एंटी-आदिवासी के रूप में प्रचारित हुई परिणामस्वरूप 28 आदिवासी आरक्षित सीटों में से मात्र 2 सीटें बीजेपी जीत पाई। अपने जल-जंगल-जमीन पर सरकार के दखल से आदिवासी सरकार से नाराज थे।

बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी


ऐसे समय में जब झारखंड में बेरोजगारी चरम पर थी, रघुवर सरकार द्वारा पिछले पाँच साल में जेपीएससी का एक बार भी परीक्षा सम्पन्न नहीं कराया जा सका, परीक्षा के लिए तारीख पर तारीख निकाले जाते रहे और हर बार तारीख बढ़ाया जाता रहा। रघुवर सरकार द्वारा बनाई गई स्थानीय नीति के कारण छात्रों में काफी रोष देखा गया, इनके द्वारा लागू की गई स्थानीय नीति के कारण झारखंड के नौकरियों और संसाधनों पर धीरे-धीरे बाहरी लोग हावी होते गए। प्लस टू (इंटरमीडिएट) विद्यालयों के लिए शिक्षक नियुक्ति में 75% राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों को नियोजित किया गया। शिक्षा मंत्री नीरा यादव द्वारा प्रेस से बातचीत में  राज्य में योग्य अभ्यर्थियों की कमी बताया गया। 
    पिछले पाँच सालों में राज्य में भूख से हुई कई मौतों को विपक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़े जोर-शोर से उठाया जिसके कारण सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, विपक्ष रघुवर सरकार को जनता के बीच गरीब विरोधी प्रचारित करने में सफल रहा। इसके अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण क़ानून मे संशोधन की कोशिश, गैरमजरूआ खास संबंधित विवादों के कारण तथा बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी के विरुद्ध सरकार की नीतियों से असंतुष्टि के कारण मतदाताओं का बड़ा वर्ग नाराज़ हुआ और देखते ही देखते यह मसला पूरे चुनाव के दौरान चर्चा में रहा।


मुख्यमंत्री रघुबर दास जी की छवि

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रघुबर दास

पिछले कुछ सालों के दौरान मुख्यमंत्री रघुबर दास की व्यक्तिगत छवि काफी ख़राब हो गई थी। जनता दरबार में फरियादियों पर कई बार उन्हें आग-बबूला होते देखा गया। कुछ लोगो को ऐसा लगने लगा था कि मुख्यमंत्री अहंकारी हो गए हैं। रघुवर दास से पार्टी के अंदर भी नाराजगी थी, कई विधायकों ने इस मुद्दे को भाजपा के शीर्ष नेताओं के सामने उठाया लेकिन शीर्ष नेताओं ने उनकी आपत्तियों पर कोई जबाब नहीं दिया। यह भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह बनी। रघुवर दास अपने हर रैली में हेमन्त सोरेन पर निशाना साधते हुवे कहते थे की सोरेन परिवार ने गरीबों-आदिवासियों के करोडों की जमीन हथिया रखा है लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में कभी कोई कार्रवाई नहीं किया। रघुवर दास के खिलाफ लोगों में कितनी नाराजगी थी इस बात का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं की एक मुख्यमंत्री होकर भी वो एक निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव हार गए।

अपनें योग्य नेताओं का पत्ता काटना


अपने नेताओं को टिकट न देकर दूसरे पार्टी से आये पाँच विधायकों को टिकट देने से भाजपा के 12-13 नेताओं में नाराजगी थी, वो बागी बनकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर आये जो कई सीटों पर हार का कारण बना। सरयू राय की गिनती ईमानदार छवि वाले नेताओं में होती है, लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान रघुबर दास और उनके रिश्ते हमेशा कड़वाहट भरे रहे, रघुबर दास ने अपना पूरा जोर लगाकर सरयू राय का टिकट काटा और फिर चुनाव में रघुवर दास के खिलाफ निर्दलीय लड़कर सरयू राय ने रघुवर दास का ऐसा टिकट काटा जो पूरा देश देख हीं रहा है।

स्थानीय मुद्दों पर चुनाव न लड़ना


झारखंड में राष्ट्रीय के बजाय स्थानीय मुद्दों का जोर रहा।
भाजपा के जो भी शीर्ष नेता कोई विधानसभा क्षेत्र में प्रचार प्रसार के लिए जाते थे केंद्र की योजनाओं को गिनाकर वोट मांगते थे। भाजपा ने पूरे चुनाव में केंद्रीय योजनाओं की डिलिवरी जैसे आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान राशि का प्रचार किया था। राम मंदिर, नागरिकता कानून जैसे मसले उठाए। इनमें कहीं भी स्थानीय लोगों से जुड़े सवाल नहीं थे। कई क्षेत्रों में बिजली-पानी की समस्या भी सरकार से नाराजगी का कारण बना।
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हेमन्त सोरेन




एक देश - एक भाषा के सपनें और उपेक्षित हिंदी


एक देश - एक भाषा के सपनें और भाषायी विवाद


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एक देश - एक भाषा की सपना साकार हो ये जरूरी है वर्षों से उपेक्षित हिंदी के उचित सम्मान के लिए, सशक्त भारत के निर्माण के लिए। एक देश - एक भाषा जरूरी है दुनियां में अपनी भाषा तथा संस्कृति की विशिष्ट पहचान के लिए। देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली जन-जन की भाषा हिंदी हीं हमारी एक देश - एक भाषा के सपनें को साकार कर सकती है।

       भाषा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के गौरव और सम्मान का प्रतीक होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनियां में 6809 भाषाएँ बोली जाती है उनमें से हिंदी दुनियां में तीसरी तथा भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व की लगभग 11% आबादी हिंदी में संवाद करती है। हिंदी विश्व के सभी महाद्वीपों तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त होती है। हिंदी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही साथ हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है।
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हिंदी दिवस का इतिहास

     14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे, हिंदी के विरोध में कई आंदोलन हुवे और अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। धीरे-धीरे देश में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ने लगा और हिंदी उपेक्षित होती चली गयी। लंबे समय तक देश मे शाषण करने वाले कांग्रेस सरकारों ने हिन्दी की उपेक्षा की है, जबकि आजादी से पहले जितने भी आंदोलन हुए, उनसे हिंदी भाषा को मातृभाषा के रूप में सम्मान और खासा प्रोत्साहन मिला था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। फिर भी आजादी के  सात दशकों के बाद राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित राजभाषा हिंदी अपने अस्तित्व-संघर्ष में प्रयत्नरत है। 
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          प्रत्येक विकसित तथा स्वाभिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है। शायद भारत इकलौता ऐसा देश है, जिसकी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। बल्कि यूं कहें कि आजादी के 72 सालों बाद भी भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है। कोई राष्ट्रभाषा होंगी, देश के कोने-कोने में यदि एक भाषा का प्रवाह होगा, तो ना केवल यह देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान करेगा बल्कि जनता को भी एक कड़ी में जोड़ने में अहम रोल निभायेगा।
          

   राजभाषा हिंदी बनाम राष्ट्रभाषा हिंदी की समस्या

         हिंदी आजादी के बाद से ही दक्षिण भारतीय नेताओं तथा कुछ स्थानीय ग़ैर-हिन्दी भाषी नेताओं के राजनीति का शिकार होती रही है ये नेता अपने क्षणिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए दशकों से हिंदी का विरोध करते आये हैं, कितनी विडम्बना है इन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी स्वीकार है लेकिन इन्हें अपने देश में सर्वाधिक बोली जानी वाली भाषा हिंदी स्वीकार नही है। गांधी जी ने हिंदी को जनमानस की भाषा बताया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को देश का राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल की थी। उनका सपना था हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा बनें लेकिन जाति-भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों और सत्ता-लोलुप नेताओं ने कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनने दिया।
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हिंदी के प्रति सरकार की उदासीनता

      आजादी के बाद से ही हिंदी के प्रचार-प्रसार में सरकारों की उदासीनता तथा सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण हिंदी अपने हीं देश में उपेक्षित रही है।
    भारतीय संविधान के भाग 17 अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए दिया गया विशेष निर्देश :- "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके..."
         परंतु पिछली यूपीए सरकार ने इसके विपरीत 2011 में अंग्रेजी को बढ़ावा देते हुवे यूपीएससी परीक्षा के प्रथम चरण में बिना सोचे समझे अंग्रेजी अनिवार्य कर दी परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं के जो अभ्यर्थी 20 से 25% इन सेवाओं में चुने जाते थे वह घटकर 3% से भी कम रह गए। भारी विरोध के बाद एनडीए सरकार द्वारा 2014 में प्रारंभिक चरण सीसैट से अंग्रेजी हटाई गई।
         

हिंदी की उपेक्षा

        वर्तमान में हमारे देश के 75% से अधिक केंद्रीय तथा राज्यस्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य है जबकि इन प्रतियोगी परीक्षाओं से नौकरी प्राप्त किये हुवे लोगों को जिन भारतीयों के बीच, जिन भारतीयों के लिए काम करना पड़ता है उनमें से 95% हिंदी भाषी या फिर स्थानीय भाषाई होते है, फिर भी पता नही क्यों सरकारें लोगों पर अंग्रेजी भाषा को जबर्दस्ती थोपने की कोशिश करती रही है और इसमें वो कामयाब भी हुई है इन्ही कारणों से भारत दुनियां में दूसरी सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की संख्या वाला देश है। गौरतलब है कि देश में एक बड़ी आबादी ऐसी हैं जो अंग्रेजी बोलने और समझने में पूरी तरह से असमर्थ हैं, इसके बावजूद हमारे देश के अधिकतर कामकाजी दफ्तरों में अंग्रेजी का ही प्रचलन है। उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के कामकाज और फैसले सारे अंग्रेजी में ही होते हैं जिसका प्रभाव इन 90 प्रतिशत लोगों पर पड़ता है। इन लोगों को पूरी तरह से वकील अथवा अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः वादी तथा प्रतिवादी दोनों को आगे की प्रक्रिया समझने में काफी दिक्कत होती है अथवा समझ ही नहीं आती। आज भारत ही नहीं विदेशी भी हिन्दी भाषा को अपना रहे हैं तो फिर हम देश में रहकर भी अपनी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय उसको खत्म करने पर क्यों तुले हैं ? सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भारत सरकार की राजभाषा में क्यों नहीं ? भारत के संविधान में लिखा है कि अंग्रेजी सिर्फ राजभाषा को सहयोग करेगी। देश के संवैधानिक पद पर बैठने वालों के लिए भारत सरकार की राजभाषा जानना अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए? गजब है हमारा देश ! सजा सुनाई जाती है, अदालत में बहस होता है, पर दोषी और दोष लगाने वाले को यह पता ही नहीं चलता कि यह लोग क्या बहस कर रहे हैं। कभी अदालत में जाकर देखिए, कटघरे में खड़ा व्यक्ति कभी अपने वकील कभी विपक्षी वकील तो कभी जज को देखता रहता हैं समझने की कोशिश करता। बाहर आकर पूछता है क्या हुआ? इस अवस्था को हम क्या न्याय मानेंगे? 
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आजादी के पश्चात यह निर्णय लिया गया था कि 1965 तक अंग्रेजी को काम में लिया जायेगा, साथ में हीं सभी विभागों में हिंदी के विकास तथा प्रचार-प्रसार के लिए उचित कदम उठाये जाएंगे और इसके पश्चात् अंग्रेजी हटा दिया जायेगा। परंतु 1963 के राजभाषा अधिनियम के तहत हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी शामिल कर लिया गया। 

एक देश एक भाषा का और हिंदी

      अगर हम हिंदी के प्रति गम्भीर होकर हिंदी भाषा को उसका देश में सर्वोच्च स्थान दिलाना चाहते हैं एक देश एक भाषा के सपनों को साकार करने चाहते हैं तो इसके लिये हमारे राजनैतिक नेतृत्व को, सभी संवैधानिक संस्थाओं को प्रथम भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने पर जोर देना होगा और राष्ट्र के तीन प्रमुख स्तम्भ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में हिंदी भाषा को प्राथमिकता देनी होगी, सभी राज्यों के उच्च न्यायालय में उस राज्य की राजभाषा और देश की राजभाषा में सुनवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी बहस तथा फैसले हों। जिस दिन भारत का सर्वोच्च न्यायालय नीतिगत फैसले हिंदी में देना शुरू कर देगा, आम नागरिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता का स्तर आज के मुकाबले ज्यादा बढ़ जाएगा। आज हिंदी भाषा को भारत के जन-जन की भाषा बनाने के लिये, भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भाषा बनाने के लिए इसके प्रति उदार होकर विचार करने की जरूरत है यदि पूरे देश के लोग एक भाषा को जानेंगे समझेंगे तो एक प्रदेश के व्यक्ति का दूसरे प्रदेश के व्यक्ति के साथ सम्पर्क जुड़ सकेगा जिससे विकास के रास्ते खुल सकेंगे।
         हिंदी भाषा के प्रयोग पर बल देते हुवे पिछले दिनों एक देश - एक टैक्स, एक देश - एक चुनाव…..के तर्ज पर ‘एक देश - एक भाषा’ पर अपना विचार प्रकट करते हुवे अमित शाह जी ने कहा था भारत में हर भाषा का अपना महत्व है लेकिन ये आवश्यक है कि देश में एक राष्ट्र भाषा हो, जो विश्व में देश को अलग पहचान दिला सके। दक्षिण भारत के कई नेताओं ने शाह से बयान वापस लेने की मांग शुरु कर दी जबकि कर्नाटक में तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरु हो गये। सोशल मीडिया में हिंदी के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार हिंदी को जबरदस्ती थोप रही है और यह उचित नहीं है। मौजूदा सरकार ने विदेशों में हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए अनेक प्रयास किये हैं, फिर भी उनके शासन में यदि देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं किया जा सका तो भविष्य में इसकी अपेक्षा दूसरी सरकारों से कम हीं है।
           हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान और समाजसेवी डॉ. फादर कामिल बुल्के ने कहा था  "संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।" आज हिंदी पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से हिंदी की स्थिति इसके विपरीत होती जा रहा है। अंग्रेजी का प्रभाव इसी तरह बढ़ता गया और पूरे देश में हिंदी स्वीकार्यता के लिए समय पर उचित उपाय नहीं किये गए तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी अपने हीं देश में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाएगी।
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          आज कल अंग्रेजी हमारे समाज में इतना प्रभावकारी हो गया है की गरीब तबके के लोग भी लाख मुसीबतें झेल कर महंगे अंग्रेजी स्कूल में ही अपने बच्चे को भर्ती करा कर उसे पढ़ाने का बंदोबस्त करते हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी की घुसपैठ बढ़ती जा रही है और ‘हिंग्लिश’ यानी हिंदी में अंग्रेजी के मिलावट को लेकर लोग गर्व करते दिख रहे हैं। लोग अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों को ठूंसते रहते हैं।
        सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों तथा उपक्रमों में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभुत्व को देखते हुवे यह कहा जा सकता है की सरकारें हिंदी के प्रसार के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं है। सवाल उठता है की आजादी के सात दशक बाद भी हिंदी को सम्मान नहीं मिलेगा तो फिर कब मिलेगा?

हिंदी पर महापुरुषों के विचार


राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त

जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - डॉ. राजेन्द्रप्रसाद

राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। - महात्मा गाँधी

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बोस

यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे

हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद

हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद सरस्वती

हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन

दक्षिण की हिन्दी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग


बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर


Monday, 16 December 2019

नागरिकता संशोधन कानून पर बवाल: देश भर में हिंसक प्रदर्शन



नागरिकता  संशोधन कानून के खिलाफ़ देश भर में प्रदर्शन

https://www.antyodaybharat.com

नागरिकता संशोधन विधेयक(2019) दोनों सदनों में पारित होने के बाद से हीं पूरे देश में इसके विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं जिसने धीरे-धीरे हिंसक रूप ले लिया है। विरोध प्रदर्शन में उपजे हिंसा को लेकर राजनीतिक पार्टियों में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, दिल्ली सहित कुछ राज्यों में हिंसक विरोध प्रदर्शन के कारण शैक्षणिक संस्थान, परिवहन के साधन तथा सार्वजनिक स्थान बुरी तरह प्रभावित हुवे हैं। पिछले चार दिनों से दिल्ली में व्यापक तौर पर आगजनी और हिंसक तोड़-फोड़ की घटनाएं लगातार सामने आ रहे हैं। प्रदर्शनकारियों और पुलिस की झड़प में 60 से अधिक छात्र, पुलिस और दमकलकर्मी घायल हुवे हैं, प्रदर्शनकारियों द्वारा डीटीसी के बसों तथा पुलिस के वाहनों में आग लगाने की समाचार सामने आई है। 
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विरोध-प्रदर्शन के दौरान आग लगाया गया डीटीसी का एक बस(फ़ोटो: साभार ट्विटर)

मेरठ तथा अलीगढ़ में कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए एहतियात के तौर पर इंटरनेट सेवा पर रोक लगाई गई है।
नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के कारण दिल्ली, आसाम, पश्चिम बंगाल सहित देश के कुछ राज्यों में अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई है। हजारों प्रदर्शकारियों की भीड़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर अराजकता फैला रहे है। सवाल उठता है ये लोग एक कानून के विरोध के नाम पर आखिर अरबों के जान-माल का नुकसान करने में क्यों लगे हैं भला उस कानून के लिए जिससे किसी भी देशवासियों का कोई नुकसान नहीं होने जा रहा है।


नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शन में रेलवे को गंभीर नुकसान

          इन सब के बाबजूद उपद्रवियों ने विरोध के नाम पर सबसे ज्यादा जिसका नुकसान किया है वो है भारतीय रेलवे। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर जिस तरह से रेलवे को निशाना बनाया जा रहा है, यह अत्यंत निंदनीय है। रेलवे के जान-माल की जिस तरह से क्षति पहुँचायी जा रही है कहाँ तक उचित है?
प्रदर्शन के दौरान रेलवे स्टेशन में आगजनी

स्टेशनों को आग के हवाले कर दिया जा रहा है। खड़ी रेल गाड़ियों और इंजनों पर भीड़ द्वारा जिस तरह से बेरहमी से पत्थरबाजी की जा रही है, वे दृश्य दिल दहलानेवाले हैं।

 पश्चिम बंगाल के उल्बेरिया एवं कई स्टेशनों (हावड़ा - खड़गपुर रेल खंड) में 13-14 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जिन लोगों ने ऐसा तांडव मचाया, ऐसी क्रूरता तथा निर्ममता दिखाई, वे इस देश के नागरिक नहीं हो सकते। एक साथ इतने लोगों का जमा होना, उग्र प्रदर्शन करना, तोड़-फोड़ करना, ताबड़तोड़ पत्थरबाजी करना और प्रशासन का यों मूकदर्शक बने रहना कई सवाल पैदा करते हैं। उन्हें क्यों तत्काल रोकने, भगाने या प्रतिरोधक कार्रवाई करने की कोई जरूरत नहीं समझी गई। आखिर क्या कारण था की सुरक्षा के लिए अधिक से अधिक पुलिस बल की तैनाती नहीं की गई? क्या राज्य प्रशासन को ऐसी घटना की कोई आशंका नहीं थी? भविष्य में ऐसी घटनाएँ नहीं हो, ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए। देखा गया है कभी-कभी कुछ राजनीतिक दबाव के कारण ऐसे मामलों में भीड़ के समक्ष पुलिस प्रशासन असहाय हो जाता है। इसका खामियाजा सार्वजनिक उपक्रमों को भुगतना पड़ता है। 
           खड़गपुर मंडल द्वारा जारी किये गए एक आंकड़े के अनुसार 13-14 दिसम्बर को उग्र प्रदर्शनकारियों द्वारा किये गए विनाशकारी तोड़-फोड़ में रेलवे को 15 करोड़ से अधिक की क्षति हुई है। देश के नागरिकों द्वारा हीं विरोध प्रदर्शन के नाम पर देश के सम्पति और नागरिकों को निशाना बनाया जाएगा तो फिर क्या फर्क रह जाएगा आतंकवादीयों और इन प्रदर्शनकारियों में।

              सोचने की बात है आखिर रेलवे को क्यों निशाना बनाया गया? क्या उस बिल से रेलवे का कोई संबंध है? हिंसक समूहों ने जिस तरह से रेलवे के जान-माल का नुकसान किया है ये इंगित करती है उनकी मानसिकता किस हद तक विकृत हो गई है। जब इस विधेयक से रेलवे का कोई लेना-देना नहीं है, तो रेलवे क्यों नुकसान सहे? देश में प्रायः कोई कानून तथा व्यक्ति के विरुद्ध प्रदर्शन के नाम पर रेलवे को निशाना बनाया जाता है। इस तरह की घटनाएं अक्सर होती रहती है, जिनसे रेलवे को काफी आर्थिक नुकसान होता है। ऐसे हिंसक प्रदर्शनकारियों पर अंकुश लगाने की जरूरत है। 

इन वीडियो में गौर से देखिए इन दहशतगर्दीयों को किसी भी तरह से ये प्रदर्शनकारी लगते हैं,  हमसफ़र एक्सप्रेस पर पत्थरबाजी करता, तोड़ता, फोड़ता इन बच्चों को क्या नागरिकता संशोधन कानून के बारे में तनिक भी जानकारी होगी, आखिर कौन इन बच्चों को बरगला कर हिंसा के लिए उतावला बना रहा है।
              बहरहाल उम्मीद है ये अराजकता के दौर जल्द ही थम जायेगें और शांति स्थापित होंगी।





Thursday, 12 December 2019

कौन जीतेगा बगोदर विधानसभा से...

किसके सर होगा बगोदर विधानसभा के विधायकी का ताज

     वर्षों से वामपंथी राजनीति का केंद्र रहे झारखंड के बगोदर विधानसभा क्षेत्र में भाकपा माले के एकछत्र राज को खत्म करते हुवे जब 2014 में भाजपा के नागेंद्र महतो पहली बार विधायक निर्वाचित हुवे तो राज्य की राजनीति में उनका नाम एक बड़े नेता के रूप में लिया जाने लगा।

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नागेंद्र महतो(बीजेपी), विनोद कुमार सिंह(माले) बासुदेव प्रसाद वर्मा(कांग्रेस)
(बायें दायें क्रमशः)

        कुछ लोग कहते हैं लगातार दो बार बगोदर से विधायक निर्वाचित हुवे भाकपा माले के विनोद कुमार सिंह जी, 2014 विधानसभा चुनाव में नागेंद्र महतो के लिए एक कठिन प्रतिद्वंद्वी थे उन्हें हराना आसान नही था, लेकिन उस समय मोदी लहर चरम पर था इसलिए वो 4339 वोटों के अंतर से जनता का विश्वास जितने में सफल रहे।

नागेन्द्र महतो के लिए चुनौतियां

         लेकिन 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए राह आसान नही है, श्री महतो के लिए चुनौतियां बहूत हैं, इन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं, भाजपा के बागी नेता बासुदेव प्रसाद वर्मा जिन्होंने हाल ही में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को अलविदा कह कांग्रेस का दामन थाम लिया है। श्री वर्मा बगोदर विधानसभा क्षेत्र के बिरनी प्रखंड से हैं और इस बार बगोदर विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार है, पिछले 30 वर्षों से वो राजनीति में सक्रिय हैं, भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष पदों पर रहते हुवे भी वो स्थानीय राजनीति को प्राथमिकता देते आये हैं।
             एक स्थानीय काँग्रेस नेता से जब कांग्रेस के जीत की संभावनाओं के बारे में अंत्योदय भारत टीम ने पूछा उनका जबाब था "युवा बेरोजगार है और नौकरीओं में बाहरियों की बहाली से परेशान है, पूरे प्रदेश को 13/11 जिलों में बाँटकर गलत स्थानीय और नियोजन नीति बनाकर सीधे तौर पर सरकार दूसरे राज्यों के छात्रों को नौकरियों में बहाली कर राज्य के युवाओं को नौकरीओं से वंचित किया है, पारा शिक्षक और आंगनबाड़ी सेविकाओं पर पड़े लाठी के घाव अभी भी नहीं भरे हैं, गैरमजरूआ खास जमीन को प्रतिबंधित करने से किसानों सहित पूरे प्रदेश की जनता खफा है, हजारों सरकारी विद्यालयों को बंद कर दिया गया। भाजपा ने सभी वर्गों का नुकसान किया है इसलिए इसबार जनता ने अपना मन बना लिया है भाजपा के झांसे में नहीं आने वाली है।"


बगोदर विधानसभा में माले का इतिहास

          नागेंद्र महतो के लिए दूसरी चुनौती हैं माले के विनोद कुमार सिंह जी जो बगोदर विधानसभा से दो बार(2005 और 2009) विधायक निर्वाचित हो चुके हैं, सादगी पसंद और जमीन से जुड़े हुवे नेता माने जाते है, स्थानीय राजनीति में सक्रिय रह कर दलितों, शोषितों, पीड़ितों, वंचितों के हक की आवाज हमेशा उठाते रहे हैं। इनके पिता कॉ महेंद्र प्रसाद सिंह अपने पूरे राजनीतिक जीवन गरीबों, मजदूरों, वंचितों के प्रति अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाते रहे। महेंद्र प्रसाद सिंह पहली बार 1990 में बगोदर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुवे और 2005 तक लगातार बगोदर विधानसभा से निर्वाचित होते रहे। उन्होंने 1982 से लेकर 2005 के दौर में बिहार और झारखंड की वामपंथी राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी। 16 जनवरी 2005 को नक्सलियों द्वारा उनकी हत्या के पश्चात विनोद कुमार सिंह जी ने इसी क्षेत्र से माले का प्रतिनिधित्व किया और लगातार दो बार विधायक निर्वाचित हुवे। राजनीति के कुछ जानकार कहते हैं, माले का बगोदर विधानसभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ है, इनका अपना एक अलग वोटर वर्ग है इस क्षेत्र के गरीबों, मजदूरों और किसानों का विश्वास सदा माले पर रहा है।

   बगोदर विधानसभा की समस्यायें

             लेकिन श्री महतो के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन पर लगा आरोप है की उन्होंने बगोदर विधानसभा क्षेत्र के जनता की समस्याओं पर कभी ध्यान नहीं दिया। वर्षों से लोग बिजली आपूर्ति की दयनीय स्थिति से पीड़ित है, कभी सप्ताह में चार-पाँच घंटे तो कभी महीनों तक बिजली गुल। बिजली आपूर्ति की इतनी खराब स्थिति के बावजूद बिजली बिल में कभी कोई कटौती नहीं किया गया। आलम ये है की बिना बिजली आपूर्ति किये एक-एक गरीब परिवार के ऊपर पंद्रह से बीस हजार का बिल बकाया है, अब सवाल उठता है की इस हाड़तोड़ महंगाई में वो मजदूरी कर दो जून के रोटी का इंतजाम करे या फिर बिजली बिल का भुगतान करे। द्वारपहरी मॉडल विद्यालय, भरकट्टा पॉवर सब स्टेशन, बरहमसिया पानी सप्लाई टंकी से पानी सप्लाई जैसी दर्जनों योजनाएं आधे अधूरे पड़े हैं।
             विनोद कुमार सिंह जी कहते है "विधानसभा क्षेत्र की जनता त्रस्त है और विधायक जी व्यस्त हैं अपने पसंद के ठेकेदार को ठेका दिलाने में।" दरअसल पिछले दिनों नागेंद्र महतो जी के पुत्र रवि महतो को रांची में कंपोजिट कंट्रोल रूम में टेंडर भरने आये ठेकेदारों को पिता के विधायक होने का रौब दिखाते हुवे टेंडर भरने से रोकने की खबर सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से छापा था।
             बहरहाल नागेंद्र महतो जी के लिए चुनौतियां कम नही है, झारखंड विकास मोर्चा की रजनी कौर भी कड़ी टक्कर में है। भाजपा के लिए बगोदर सीट महत्वपूर्ण है, कोई बड़े उलटफेर न हो जाए इसलिए बड़े चेहरों से यहाँ चुनाव प्रचार करा रही हैं पिछले दिनों वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह और भोजपुरी गायक पवन सिंह को नागेंद्र महतो के समर्थन में चुनाव प्रचार करते देखा गया।
           लोकतंत्र में वोट जनता की ताकत होती है, जनता मालिक होती है लेकिन कुछ नेता सत्ता हाथ लगते ही अपने को मालिक और जनता को नौकर समझ बैठते हैं।
             चुनाव में पांच दिन बाकी है, अब सवाल उठता है जनता किसपर विश्वास करेंगीं? क्या नागेंद्र महतो अपनी सीट बचा पाएंगे? क्या विनोद कुमार सिंह अपनी पिछली हार को जीत में बदल पाएँगे? या फिर जनता बासुदेव प्रसाद वर्मा को पहली बार विधानसभा जाने का मौका देंगी। प्रश्न बहुत हैं लेकिन इनके उत्तर देना जल्दबाजी होगा।
           देखना दिलचस्प होगा बगोदर विधानसभा क्षेत्र के 3 लाख 13 हजार 861 वोटर किसे वोट देने का मन बनाकर 16 दिसम्बर को घर से निकलते हैं और 23 दिसंबर को किन्हें चुनते हैं। जो भी निर्वाचित हो जनता को उम्मीद है  उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में उचित प्रयास किये जाएंगे।

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भारत मे प्रदूषण की समस्या

Wednesday, 11 December 2019

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती


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  1. 21वीं शताब्दी में भारत जहाँ दुनियां में एक बहुत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रही है, वहीं भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है ,भारत में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत प्रदूषण के कारण हो रही है। समय पर यदि दूषित होते पर्यावरण को रोकने का सही उपाय नही किया गया तो भविष्य में जीवन को प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे शीर्ष पर प्रदूषण हीं होगा...

बढ़ता प्रदूषण - सिमटता जीवन

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 2019 लिए जारी रिपोर्ट में दुनिया के 15 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में इस बार भी भारत के 14 शहर शामिल हैं। इनमें पहले स्थान पर कानपुर के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का फरीदाबाद दूसरे और बनारस तीसरे नंबर पर है। भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है जहां हर साल लगभग 20 लाख लोग प्रदूषित हवा की वजह से मर रहे हैं। दुनिया में प्रदूषित हवा से होने वाली हर 4 मौतों में से एक भारत में होती है।
          प्रदूषण की इस खतरनाक स्थिति को लेकर पहले भी चिंता ज़ाहिर की गई थी। पिछले साल की तरह इस साल भी भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री में कमी लाने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट के आदेश का असर कम ही दिखा क्योंकि कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धार्मिक दृष्टिकोण से देखने लगते है उन्हें लगता है ये प्रतिबंध उनके धार्मिक आजादी पर हमला है।
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    प्रदूषण के प्रभाव 


       भारत में बड़े शहरों से इतर अब छोटे-छोटे शहरों में भी हवा सांस लेने लायक नहीं है। उसमें घुला जहर लोगों को न सिर्फ धीरे-धीरे बीमार कर रहा है बल्कि उनकी मौत की वजह भी बन रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर हैं जहां हवा में प्रदूषण की मात्रा राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने पिछले साल दिल्ली में वायु प्रदूषण को देखते हुए स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा करते हुए लोगों से घरों के बाहर न निकलने की अपील की थी। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल दिल्ली की हवा में सांस लेना दिनभर में 44 सिगरेट पीने जितना खतरनाक बताया था।

भारत मे प्रदूषण मापक सूचकांक

      वायु की गुणवत्ता की माप के लिए विश्व के विभिन्न देशों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AIR QUALITY INDEX) बनाये गये हैं, ये सूचकांक देश में वायु की गुणवत्ता को मापते हैं और बताते हैं कि वायु में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए मापदंड से अधिक है या नहीं।
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 इसके माप के लिए AQI(वायु गुणवत्ता सूचकांक) और PM(पार्टिकुलेट मैटर) जैसे शब्द इस्तेमाल होते है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म संघटक है जिसे मानव शरीर के लिए सबसे ख़तरनाक माना जाता है। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना। हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम 10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है। पिछले दो-तीन सालों से अंतिम तीन महीनों में दिल्ली और उसके समीपवर्ती शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर देखा जा रहा है, इसका कारण पंजाब-हरियाणा में धान की पराली को जलाना बताया जाता है, साथ ही नवम्बर में दीवाली के समय शहरों में अंधाधुंध पटाखे छोड़े जाने के कारण हवाएं और जहरीली हो जाती है। इन महीनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AQI) अति खतरनाक(350+) स्तर तक पहुँच जाता है। 

     राजधानी दिल्ली में प्रदूषण

     राजधानी दिल्ली और आसपास में बढ़ते प्रदूषण के रोकथाम के लिए दिल्ली सरकार द्वारा ऑड-ईवन स्किम जारी किया किया गया था, एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऑड-ईवन स्कीम प्रदूषण से निपटने का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने प्रदूषण के स्थायी निदान के लिए उचित उपाय करने के निर्देश दिए है।
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तीन अलग-अलग दिनों के AQI (दिल्ली)

आंकड़े बताते हैं 80 प्रतिशत भारतीय शहर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते।
         

    वायु प्रदूषण के प्रभाव

   वायु प्रदूषण के कारण सबसे अधिक मौतें (43 प्रतिशत) फेफड़ों से संबंधित बीमारियों से होती हैं. इनमें कैंसर से 14 और फेफड़ों से संबंधित दूसरी बीमारियों से 29 प्रतिशत मौतें होती हैं. इसके अतिरिक्त ब्रेन स्ट्रोक से 24 और हृदय संबंधी बीमारियों के चलते 25 प्रतिशत मौतें होती हैं।

भारत में प्रदूषण के कारण

          भारतीय शहरों की हवा भी बेतहाशा दौड़ते वाहनों से जहरीली होती जा रही है, सरकार को इसे सीमित व नियंत्रित करने के उपाय जल्दी ही ढूँढने होंगे। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन का धुआं, हवा को जहरीली बना रहा है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बड़ी और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है, प्रारंभिक तौर पर हमें हमारे गांवों की हवा को शुद्ध रखने के लिए इस बात का खासतौर से ख्याल रखना होगा कि ईंधन के बतौर लकड़ी, कोयले का कम से कम इस्तेमाल हो। इस दिशा में भारत सरकार का उज्ज्वला योजना जैसी सार्थक पहल सराहनीय है, इस योजना के तहत अभी तक लगभग 8 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं को किफायती दर पर एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराया जा चुका है। इससे इन महिलाओं को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने से निजात मिली है।

  प्रदूषण आज वैश्विक समस्या

     प्रदूषण के कारण पूरा विश्व आज भूमंडलीय ऊष्मीकरण जैसे खतरनाक चुनौतियों का सामना कर रहा है, भूमंडलीय ऊष्मीकरण के कारण हर साल पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, एक आंकड़े बताते है पिछले 100 सालों में विश्व के तापमान में औसत 0.7 डिग्री सेल्सियस की व्रद्धि हुई है और ऋतु परिवर्तन का चक्र अनिशचित हो गया है, कहीं पर सूखा तो कहीं पर बाढ़ सामान्य सी बात हो गयी है। आज ऐसा कोई भी देश नहीं है जो भूमंडलीय ऊष्मीकरण के दुष्प्रभाव से खुद को बचा पाया हो। समय के साथ-साथ पेड़-पौधे व पशु-पक्षियों की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं और लुप्त होने की कगार पर हैं यदि पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन इसी तरह लगातार होता रहा तो एक दिन मानव जाति के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग जायेगा।

           धरती पर ताजे पानी का स्तर हर दिन घटता ही जा रहा है। पृथ्वी पर पीने के पानी की उपलब्धता सीमित है जबकि वो भी इंसानों की गलत गतिविधियों की वजह से प्रदूषित हो रही है। जरा सोचिए कोई अगर 200 साल पहले आज के बारे में कहता की पानी बोतल में बंद करके उच्चे दामों में बेचा जाएगा तो लोग उसे बेवकूफ समझते लेकिन आज ये सच है, हमनें पानी को पीने लायक नही बचा सका, वर्षा के मीठे जल समय पर संचयित नही किया गया परिणाम स्वरूप वो नदियों में बहते हुवे समुद्र में मिल गए। कहीं-कहीं पानी की इतनी कमी है कि लोग नलों के सामने घण्टो तक सैकड़ों मीटर लाइन में लगे रहते है एक बाल्टी पानी के लिए। सच तो ये है कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी के रूप में जन्नत दिया था रहने के लिए लेकिन हमलोगों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर करके जहन्नुम बना दिया। अभी समय है सचेत होने का पर्यावरण को बचाने का पेड़ - पौधों को लगाने का...
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नही तो वो दिन दूर नही जब बारिशें नही होंगी, लोग बून्द बून्द पानी के लिए तरशेंगे, पेड़ पौधे उजड़ जाएंगे, लोग ऑक्सीजन की कमी से कुछ सेकेंड की जिंदगी के लिए तरशेंगे...




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Sunday, 8 December 2019

हलधर नाग: पद्मश्री से सम्मानित मात्र तीसरी पास कोसली भाषा के महान कवि


मात्र तीसरी पास महान कवि पद्मश्री हलधर नाग के जीवन संघर्ष की कहानी

'लोककवि रत्न' के उपनाम से साहित्य की दुनियां में प्रसिद्ध कोशली भाषा के महान कवि पद्मश्री हलधर नाग जी के जीवन संघर्ष की कहानी।  
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हलधर नाग

हलधर नाग का जीवन संघर्ष

दुनियां में कुछ लोग जीवन में आने वाले छोटी-छोटी बाधाओं और असफलताओं से घबरा जाते है, हतोत्साहित हो जाते हैं, परिस्थितियों से हार मान लेते हैं और जीवन को प्रभावित कर बैठते है।
          वहीं कुछ दृढ़ निश्चयी, सफलता की अभीप्सु तथा अटूट आत्मविश्वास वाले लोग हैं जिन्हें न उनकी असफलता हरा पाती है और न हीं बुरे हालात और परिस्थितियाँ उन्हें उनके कर्मपथ से डिगा पाती है।
    एक ऐसे हीं व्यक्ति की यह असाधारण कहानी है, जो सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के वावजूद सफलता की उचाईयों को छुवे है। ये कहानी है उड़ीसा के कोशली भाषा के महान कवि और लेखक श्री हलधर नाग जी की, जिन्होंने साबित किया है की यदि दृढ़ निश्चय हो तो दुनियां में कुछ भी नामुमकिन नहीं।

हलधर नाग जीवन परिचय

         श्री हलधर नाग जी का जन्म 31 मार्च 1950 को ओड़ीसा के बरगढ़ जिला के घेंस गांव में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। जब ये मात्र 10 वर्ष के थे तो उनके पिता का देहांत हो गया। श्री नाग मात्र तीसरी कक्षा तक की औपचारिक शिक्षा ले सके क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद घर की दयनीय स्थिति को देखकर इन्हें बीच मे ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, घर के खर्चे के लिए इन्हें दो साल तक पास के होटल में बर्तन धोने का काम करना पड़ा, फिर गाँव के प्रमुख के मदद से एक उच्च विद्यालय के होस्टल में रसोइया का काम मिल गया जहाँ उन्होंने 16 वर्षों तक काम किया, स्कूल में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि उनके गाँव में बहुत सारे स्कूल खुल रहे हैं फिर श्री नाग एक बैंक से 1,000 रुपए लोन लेकर स्‍कूली बच्‍चों के लिए स्‍टेशनरी और खाने-पीने के दूसरे सामानों वाली एक छोटी दुकान खोल ली।

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   हलधर नाग का साहित्यिक जीवन
          

     श्री नाग बचपन से ही लोक साहित्य और लोक गीतों में रुचि रखते थे, कोशली में लोक कथाएँ लिखने वाले नाग ने 1990 में अपनी पहली कविता लिखी। जब उनकी कविता ‘धोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद का पेड़) एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो इसके बाद उन्होंने चार और कवितायेँ भेज दी और वो सभी प्रकाशित हो गए। इससे कविता लेखन के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया, आस-पास के गांवों का दौरा कर अपनी कविताओं को सुनाने लगे लोग उन्हें सम्मानित करने लगे जिससे उनका प्रोत्साहन बढ़ता गया, उनकी कविताओं को आलोचकों और प्रशंसकों से सराहना मिलने लगी। यहीं से उन्हेंलोक कवि रत्ननाम से जाना जाने लगा और इसके बाद उन्होंने दुबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा।
           हलधर नाग को अपनी सारी कविताएं और अब तक उनके लिखे 20 महाकाव्य कंठस्थ हैं। श्रीनाग की कोसली भाषा की कविता संबलपुर विश्वविद्यालय के पाँच विद्वानों के पीएचडी अनुसंधान का विषय रहा है। संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा उनके लेखन के संग्रह 'हलधर ग्रंथावली-2' को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। 

हलधर नाग की कुछ कवितायें और महाकाव्य

हलधर ग्रन्थावली -१
हलधर ग्रन्थावली -२
सम्पर्द
कृष्णगुरु
लोकगीत
अछिया
बछर
महासती उर्मिला
प्रेम पाइछन
तारा मन्दोदरी
करमसानी
रसिया कवि
शिरी समलाइ
बीर सुरेन्द्र साइ

        उनकी कवितायें और महाकाव्य सामाजिक मुद्दों और हालात के बारे में बात करती है, उत्पीड़न, धर्म, प्रकृति और पौराणिक कथाओं से लड़ती है, जो उनके आस-पास के दैनिक जीवन से ली गई हैं।
                श्री नाग का मानना है की कविताओं में वास्तविक जीवन से जुड़ाव और लोगों के लिए एक संदेश होना चाहिए। उनका मानना है की हर कोई एक कवि है, पर कुछ ही लोगों के पास उन्हें आकार देने की कला होती है। दिन-प्रतिदिन युवाओं के कोसली भाषा की कविताओं और महाकाव्यों के प्रति बढ़ती रुचि को देखकर उन्हें अच्छा लगता है।

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पद्मश्री पुरुस्कार ग्रहण करते श्री नाग
   
सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श को अपनाने वाले श्री नाग हमेशा मात्र एक सफेद धोती-बनियान पहनते है और नंगे पैर चलते है। श्री नाग को उड़िया साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्हें उनके कोसली भाषा साहित्य में असाधारण योगदान के लिए 2019 में संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया है।

हलधर नाग जी के जीवन से सीख

       उनका जीवन संघर्ष हमें प्रेरणा देती है की कठिन परिश्रम और दृढ़ निश्चय से नामुमकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है। दुनिया का हर व्यक्ति जीवन में सफलता की उम्मीद करता हैं इसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मुकाम के करीब पहुँच भी जाता है लेकिन कुछ कठिन संघर्ष को सामने देख सफलता से वंचित हो जाता है।
        श्री नाग का जीवन संघर्ष, जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव कराता है, सतत सक्रिय रहना सिखाता है, जीवन के कई रंग दिखाता है, कठिनाइयों से पार पाना सिखाता है, अनुभवी बनाता है, समय की कीमत सिखाता है जिससे प्रेरित होकर हम दृढ़ विश्वास के साथ फिर से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो सकें। हमें सिख देता है की जीवन 'संघर्ष' का दूसरा नाम हैं, जीवन का सबसे बड़ा वरदान है, वो हमें सहनशील, संवेदनशील और देवतुल्य बनाता हैं और सबसे जरूरी जमीन से जुड़े रहना सिखाता है। 
             श्री नाग को एक सूत्र से परिभाषित करने की कोशिश करें तो वो सूत्र इस प्रकार का हो सकता है।
             दृढ़ इच्छाशक्ति + दृढ़ विश्वास + दृढ़ संकल्प + स्थिरता + कड़ी मेहनत = हलधर नाग
             


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