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Wednesday, 25 December 2019

झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


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झारखंड निर्माण के 19 वर्ष बित चुके हैं, इन 19 वर्षों में झारखण्ड ने 10 मुख्यमंत्री देखे हैं। इनमें से केवल रघुवर दास हीं अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा कर पाएं हैं, इन 19 सालों में 13 साल तक झारखंड में भाजपा ने शासन किया है। फिर भी झारखण्ड की बदहाली की बात जब आती है तो भाजपा के नेता, कांग्रेस और झामुमो को जिम्मेदार बता देते हैं। 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव बीजेपी बुरी तरह से हार गई। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान रघुवर दास पूर्ण विश्वास दिखाते रहे और कहते रहे कि अबकी बार 65 पार, चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री का दावा जुमला साबित हुआ और झारखंड में बीजेपी 65 से आधी सीटें भी नहीं ला पाई, इन चुनावों में बीजेपी को सिर्फ 25 सीटें मिलीं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने में हुवे उलटफेर से बीजेपी कोई रिस्क लिए बिना सतर्क होकर चल रही थी लेकिन उनका ये दाँव काम न आया। झामुमो, कांग्रेस तथा राजद गठबन्धन को मिले स्पष्ट जनादेश के बाद नई सरकार बनाने के लिए तैयार है।   
        इस हार के कई कारण हैं, कुछ प्रमुख कारण जिसके कारण बीजेपी झारखण्ड में चुनाव हार गई...


बिना सहयोगियों के चुनाव लड़ना


झारखण्ड निर्माण के बाद से हीं चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव बीजेपी और आजसू  मिलकर चुनाव लड़ते आई है। लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर हुवे खींचतान के कारण सम्भवतः इस बार बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। कुछ लोग आजसू द्वारा अधिक सीटें मांगे जाने की बात भी करते है।
      झारखंड विधानसभा चुनाव में आजसू ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 2 सीटें जीती है, मतलब साथ में चुनाव लड़ते तो 27 सीटें जरूर जीतते इसके अतिरिक्त बड़कागांव, जामा, चक्रधरपुर, नाला, मधुपुर, डूमरी, घाटसिला, जुगसलई, इचागढ़, गांडेय, खिजरी, लोहरदगा और रामगढ़ ये वो तेरह विधानसभा क्षेत्र हैं जहाँ आजसू और बीजेपी के वोट जोड़ दें तो भाजपा गठबंधन की जीत हो सकती थी।
      वहीं, केंद्र में भाजपा के साथ गठबंधन में सहयोगी लोकजन शक्ति पार्टी ने भी करीब 50 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा, इससे वोटों का बंटवारा हुआ, कई सीटों पर आजसू और एलजेपी ने बीजेपी के वोट काटे। इस तरह बीजेपी का अपने सहयोगियों से अलग होकर चुनाव लड़ना गलत फैसला साबित हुवा।


गैर आदिवासी मुख्यमंत्री और आदिवासियों की नाराजगी


झारखंड निर्माण के 14 साल बाद 2014 में पहली बार  रघुवर दास झारखंड के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने, उस झारखंड में जहां राज्य की कुल आबादी के एक चौथाई से अधिक आदिवासियों की आबादी है और 81 में से 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। भाजपा सरकार में पहले मुख्यमंत्री रह चुके आदिवासी समुदाय से आने वाले अर्जुन मुंडा को नजरअंदाज कर गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनाये जाने के कारण आदिवासियों में भाजपा की छवि एंटी-आदिवासी के रूप में प्रचारित हुई परिणामस्वरूप 28 आदिवासी आरक्षित सीटों में से मात्र 2 सीटें बीजेपी जीत पाई। अपने जल-जंगल-जमीन पर सरकार के दखल से आदिवासी सरकार से नाराज थे।

बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी


ऐसे समय में जब झारखंड में बेरोजगारी चरम पर थी, रघुवर सरकार द्वारा पिछले पाँच साल में जेपीएससी का एक बार भी परीक्षा सम्पन्न नहीं कराया जा सका, परीक्षा के लिए तारीख पर तारीख निकाले जाते रहे और हर बार तारीख बढ़ाया जाता रहा। रघुवर सरकार द्वारा बनाई गई स्थानीय नीति के कारण छात्रों में काफी रोष देखा गया, इनके द्वारा लागू की गई स्थानीय नीति के कारण झारखंड के नौकरियों और संसाधनों पर धीरे-धीरे बाहरी लोग हावी होते गए। प्लस टू (इंटरमीडिएट) विद्यालयों के लिए शिक्षक नियुक्ति में 75% राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों को नियोजित किया गया। शिक्षा मंत्री नीरा यादव द्वारा प्रेस से बातचीत में  राज्य में योग्य अभ्यर्थियों की कमी बताया गया। 
    पिछले पाँच सालों में राज्य में भूख से हुई कई मौतों को विपक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़े जोर-शोर से उठाया जिसके कारण सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, विपक्ष रघुवर सरकार को जनता के बीच गरीब विरोधी प्रचारित करने में सफल रहा। इसके अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण क़ानून मे संशोधन की कोशिश, गैरमजरूआ खास संबंधित विवादों के कारण तथा बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी के विरुद्ध सरकार की नीतियों से असंतुष्टि के कारण मतदाताओं का बड़ा वर्ग नाराज़ हुआ और देखते ही देखते यह मसला पूरे चुनाव के दौरान चर्चा में रहा।


मुख्यमंत्री रघुबर दास जी की छवि

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रघुबर दास

पिछले कुछ सालों के दौरान मुख्यमंत्री रघुबर दास की व्यक्तिगत छवि काफी ख़राब हो गई थी। जनता दरबार में फरियादियों पर कई बार उन्हें आग-बबूला होते देखा गया। कुछ लोगो को ऐसा लगने लगा था कि मुख्यमंत्री अहंकारी हो गए हैं। रघुवर दास से पार्टी के अंदर भी नाराजगी थी, कई विधायकों ने इस मुद्दे को भाजपा के शीर्ष नेताओं के सामने उठाया लेकिन शीर्ष नेताओं ने उनकी आपत्तियों पर कोई जबाब नहीं दिया। यह भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह बनी। रघुवर दास अपने हर रैली में हेमन्त सोरेन पर निशाना साधते हुवे कहते थे की सोरेन परिवार ने गरीबों-आदिवासियों के करोडों की जमीन हथिया रखा है लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में कभी कोई कार्रवाई नहीं किया। रघुवर दास के खिलाफ लोगों में कितनी नाराजगी थी इस बात का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं की एक मुख्यमंत्री होकर भी वो एक निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव हार गए।

अपनें योग्य नेताओं का पत्ता काटना


अपने नेताओं को टिकट न देकर दूसरे पार्टी से आये पाँच विधायकों को टिकट देने से भाजपा के 12-13 नेताओं में नाराजगी थी, वो बागी बनकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर आये जो कई सीटों पर हार का कारण बना। सरयू राय की गिनती ईमानदार छवि वाले नेताओं में होती है, लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान रघुबर दास और उनके रिश्ते हमेशा कड़वाहट भरे रहे, रघुबर दास ने अपना पूरा जोर लगाकर सरयू राय का टिकट काटा और फिर चुनाव में रघुवर दास के खिलाफ निर्दलीय लड़कर सरयू राय ने रघुवर दास का ऐसा टिकट काटा जो पूरा देश देख हीं रहा है।

स्थानीय मुद्दों पर चुनाव न लड़ना


झारखंड में राष्ट्रीय के बजाय स्थानीय मुद्दों का जोर रहा।
भाजपा के जो भी शीर्ष नेता कोई विधानसभा क्षेत्र में प्रचार प्रसार के लिए जाते थे केंद्र की योजनाओं को गिनाकर वोट मांगते थे। भाजपा ने पूरे चुनाव में केंद्रीय योजनाओं की डिलिवरी जैसे आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान राशि का प्रचार किया था। राम मंदिर, नागरिकता कानून जैसे मसले उठाए। इनमें कहीं भी स्थानीय लोगों से जुड़े सवाल नहीं थे। कई क्षेत्रों में बिजली-पानी की समस्या भी सरकार से नाराजगी का कारण बना।
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हेमन्त सोरेन




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