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Wednesday, 11 December 2019

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती


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  1. 21वीं शताब्दी में भारत जहाँ दुनियां में एक बहुत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रही है, वहीं भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है ,भारत में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत प्रदूषण के कारण हो रही है। समय पर यदि दूषित होते पर्यावरण को रोकने का सही उपाय नही किया गया तो भविष्य में जीवन को प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे शीर्ष पर प्रदूषण हीं होगा...

बढ़ता प्रदूषण - सिमटता जीवन

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 2019 लिए जारी रिपोर्ट में दुनिया के 15 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में इस बार भी भारत के 14 शहर शामिल हैं। इनमें पहले स्थान पर कानपुर के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का फरीदाबाद दूसरे और बनारस तीसरे नंबर पर है। भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है जहां हर साल लगभग 20 लाख लोग प्रदूषित हवा की वजह से मर रहे हैं। दुनिया में प्रदूषित हवा से होने वाली हर 4 मौतों में से एक भारत में होती है।
          प्रदूषण की इस खतरनाक स्थिति को लेकर पहले भी चिंता ज़ाहिर की गई थी। पिछले साल की तरह इस साल भी भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री में कमी लाने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट के आदेश का असर कम ही दिखा क्योंकि कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धार्मिक दृष्टिकोण से देखने लगते है उन्हें लगता है ये प्रतिबंध उनके धार्मिक आजादी पर हमला है।
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    प्रदूषण के प्रभाव 


       भारत में बड़े शहरों से इतर अब छोटे-छोटे शहरों में भी हवा सांस लेने लायक नहीं है। उसमें घुला जहर लोगों को न सिर्फ धीरे-धीरे बीमार कर रहा है बल्कि उनकी मौत की वजह भी बन रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर हैं जहां हवा में प्रदूषण की मात्रा राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने पिछले साल दिल्ली में वायु प्रदूषण को देखते हुए स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा करते हुए लोगों से घरों के बाहर न निकलने की अपील की थी। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल दिल्ली की हवा में सांस लेना दिनभर में 44 सिगरेट पीने जितना खतरनाक बताया था।

भारत मे प्रदूषण मापक सूचकांक

      वायु की गुणवत्ता की माप के लिए विश्व के विभिन्न देशों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AIR QUALITY INDEX) बनाये गये हैं, ये सूचकांक देश में वायु की गुणवत्ता को मापते हैं और बताते हैं कि वायु में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए मापदंड से अधिक है या नहीं।
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 इसके माप के लिए AQI(वायु गुणवत्ता सूचकांक) और PM(पार्टिकुलेट मैटर) जैसे शब्द इस्तेमाल होते है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म संघटक है जिसे मानव शरीर के लिए सबसे ख़तरनाक माना जाता है। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना। हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम 10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है। पिछले दो-तीन सालों से अंतिम तीन महीनों में दिल्ली और उसके समीपवर्ती शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर देखा जा रहा है, इसका कारण पंजाब-हरियाणा में धान की पराली को जलाना बताया जाता है, साथ ही नवम्बर में दीवाली के समय शहरों में अंधाधुंध पटाखे छोड़े जाने के कारण हवाएं और जहरीली हो जाती है। इन महीनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AQI) अति खतरनाक(350+) स्तर तक पहुँच जाता है। 

     राजधानी दिल्ली में प्रदूषण

     राजधानी दिल्ली और आसपास में बढ़ते प्रदूषण के रोकथाम के लिए दिल्ली सरकार द्वारा ऑड-ईवन स्किम जारी किया किया गया था, एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऑड-ईवन स्कीम प्रदूषण से निपटने का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने प्रदूषण के स्थायी निदान के लिए उचित उपाय करने के निर्देश दिए है।
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तीन अलग-अलग दिनों के AQI (दिल्ली)

आंकड़े बताते हैं 80 प्रतिशत भारतीय शहर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते।
         

    वायु प्रदूषण के प्रभाव

   वायु प्रदूषण के कारण सबसे अधिक मौतें (43 प्रतिशत) फेफड़ों से संबंधित बीमारियों से होती हैं. इनमें कैंसर से 14 और फेफड़ों से संबंधित दूसरी बीमारियों से 29 प्रतिशत मौतें होती हैं. इसके अतिरिक्त ब्रेन स्ट्रोक से 24 और हृदय संबंधी बीमारियों के चलते 25 प्रतिशत मौतें होती हैं।

भारत में प्रदूषण के कारण

          भारतीय शहरों की हवा भी बेतहाशा दौड़ते वाहनों से जहरीली होती जा रही है, सरकार को इसे सीमित व नियंत्रित करने के उपाय जल्दी ही ढूँढने होंगे। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन का धुआं, हवा को जहरीली बना रहा है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बड़ी और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है, प्रारंभिक तौर पर हमें हमारे गांवों की हवा को शुद्ध रखने के लिए इस बात का खासतौर से ख्याल रखना होगा कि ईंधन के बतौर लकड़ी, कोयले का कम से कम इस्तेमाल हो। इस दिशा में भारत सरकार का उज्ज्वला योजना जैसी सार्थक पहल सराहनीय है, इस योजना के तहत अभी तक लगभग 8 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं को किफायती दर पर एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराया जा चुका है। इससे इन महिलाओं को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने से निजात मिली है।

  प्रदूषण आज वैश्विक समस्या

     प्रदूषण के कारण पूरा विश्व आज भूमंडलीय ऊष्मीकरण जैसे खतरनाक चुनौतियों का सामना कर रहा है, भूमंडलीय ऊष्मीकरण के कारण हर साल पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, एक आंकड़े बताते है पिछले 100 सालों में विश्व के तापमान में औसत 0.7 डिग्री सेल्सियस की व्रद्धि हुई है और ऋतु परिवर्तन का चक्र अनिशचित हो गया है, कहीं पर सूखा तो कहीं पर बाढ़ सामान्य सी बात हो गयी है। आज ऐसा कोई भी देश नहीं है जो भूमंडलीय ऊष्मीकरण के दुष्प्रभाव से खुद को बचा पाया हो। समय के साथ-साथ पेड़-पौधे व पशु-पक्षियों की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं और लुप्त होने की कगार पर हैं यदि पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन इसी तरह लगातार होता रहा तो एक दिन मानव जाति के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग जायेगा।

           धरती पर ताजे पानी का स्तर हर दिन घटता ही जा रहा है। पृथ्वी पर पीने के पानी की उपलब्धता सीमित है जबकि वो भी इंसानों की गलत गतिविधियों की वजह से प्रदूषित हो रही है। जरा सोचिए कोई अगर 200 साल पहले आज के बारे में कहता की पानी बोतल में बंद करके उच्चे दामों में बेचा जाएगा तो लोग उसे बेवकूफ समझते लेकिन आज ये सच है, हमनें पानी को पीने लायक नही बचा सका, वर्षा के मीठे जल समय पर संचयित नही किया गया परिणाम स्वरूप वो नदियों में बहते हुवे समुद्र में मिल गए। कहीं-कहीं पानी की इतनी कमी है कि लोग नलों के सामने घण्टो तक सैकड़ों मीटर लाइन में लगे रहते है एक बाल्टी पानी के लिए। सच तो ये है कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी के रूप में जन्नत दिया था रहने के लिए लेकिन हमलोगों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर करके जहन्नुम बना दिया। अभी समय है सचेत होने का पर्यावरण को बचाने का पेड़ - पौधों को लगाने का...
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नही तो वो दिन दूर नही जब बारिशें नही होंगी, लोग बून्द बून्द पानी के लिए तरशेंगे, पेड़ पौधे उजड़ जाएंगे, लोग ऑक्सीजन की कमी से कुछ सेकेंड की जिंदगी के लिए तरशेंगे...




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