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Friday, 31 January 2020

बाबूलाल मरांडी : एक शिक्षक से झारखंड के पहले मुख्यमंत्री तक का सफर

बाबूलाल मरांडी : एक शिक्षक से झारखंड के पहले मुख्यमंत्री तक का सफर


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बाबूलाल मरांडी एक ऐसी शख्सियत जिनका जिक्र किए बगैर झारखंड का इतिहास लिखना शायद सम्भव नहीं है। दशकों के राजनीतिक संघर्ष के बाद जब 15 नवम्बर 2000 को झारखंड अस्तित्व में आया तो बाबूलाल मरांडी को झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुवा। एक शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत कर झारखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले श्री बाबूलाल मरांडी जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।

प्रारंभिक जीवन परिचय

बाबूलाल मरांडी जी का जन्म 11 जनवरी 1958 को झारखंड के गिरिडीह जिला के तीसरी प्रखंड के कोदाईबांक नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम छोटे लाल मरांंडी तथा माता का नाम श्रीमती मीना मुर्मू है। वह झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा वर्तमान में झारखंड के धनवार विधानसभा से विधायक हैं।

मरांडी जी की शिक्षा 

श्री मरांडी का प्राथमिक शिक्षा गाँव के हीं प्राथमिक स्कूल में हुई। गिरिडीह कॉलेज गिरिडीह से बीए ऑनर्स की डिग्री ली। कॉलेज के दिनों से हीं उनका झुकाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ बढ़ा। कॉलेज खत्म होने के पश्चात वे कुछ सालों तक एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षण का कार्य किए फिर शिक्षण छोड़कर आरएसएस से पूर्णकालिक जुड़ गए। 
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उन्हें 1983 में झारखंड के दुमका में संथाल परगना क्षेत्र का विश्व हिन्दू परिषद का संगठन सचिव बनाया गया। 1989 में इनकी शादी शांति देवी से हुई। उनके दो पुत्र हुवे सनातन मरांडी तथा अनूप मरांडी। झारखंड के गिरिडीह के चिलखारी गाँव में एक आदिवासी सांस्कृतिक कार्यक्रम में 26 अक्टूबर 2007 को हुए एक नक्‍सली हमले में छोटे सुपुत्र अनूप मरांडी की मौत हो गई। 

बाबुलाल जी का राजनीतिक जीवन

श्री मरांडी के लंबे समय तक दुमका क्षेत्र में संघ के प्रचार-प्रसार में लगे रहने के कारण वे इस क्षेत्र की जनता के बीच एक जाना माना चेहरा हो गए। 1991 में भाजपा के महामंत्री गोविन्दाचार्य की अगुवाई में भाजपा में शामिल हुए तथा 1991 लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा से चुनाव लड़े लेकिन दिग्गज शिबू सोरेन से हार गए। 1996 लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिर से सोरेन को चुनौती दी। इस बार मात्र 5 हजार वोटों से वो हार गए। लगातार हार के बावजूद भाजपा में बाबूलाल मरांडी का कद बढ़ता गया। 1998 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें झारखंड क्षेत्र के भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया और पार्टी उनके नेतृत्‍व में झारखंड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 सीटें जितने में सफल रही। इस लोकसभा चुनाव में उन्होंने शिबू शोरेन को दुमका से हराकर पहली बार संसद पहुँचे। 1999 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को दुमका से हराया। इस लगातार जीत से मरांडी के राजनीति को ताकत मिली। 1999 में अटल सरकार में उन्हें वन पर्यावरण राज्य मंत्री बनाया गया।
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अलग झारखंड राज्य निर्माण

15 नवम्बर 2000 को अलग झारखंड राज्य के गठन के पश्चात बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में झारखंड में एनडीए ने पहली सरकार बनाई। अपने कार्यकाल में मरांडी ने नए झारखंड के विकास के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इनमें से एक था सड़कों का विकास।
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 इसके अतिरिक्त शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई सराहनीय कदम उठाये जिसमें छात्राओं के लिए साइकिल की व्यवस्था, ग्राम शिक्षा समिति बनाकर स्थानीय विद्यालयों में ग्रामीणों द्वारा पारा शिक्षकों की बहाली, सभी गाँवों, पंचायतों और प्रखण्डों में आवश्यकतानुसार विद्यालयों का निर्माण तथा शिक्षकों की नियुक्ति प्रमुख था। राज्य में बिजली और पानी की उचित व्यवस्था, रोजगार, लघु उधोग तथा कृषि के विकास के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की। जनता को विश्वास होने लगा था झारखण्ड राज्य विकास की ओर अग्रसित हो रहा है लेकिन 2003 में झारखंड में डोमिसाइल लागू कर झारखंड वासियों की पहचान सुनिश्चित करने का उनका निर्णय आत्मघाती साबित हुवा। उनके इस विचार से केंद्र की सरकार में शामिल सहयोगी पार्टी जदयू के दबाव में भाजपा को बाबूलाल मरांडी को अपदस्थ कर अर्जुन मुंडा को झारखंड का नया मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। अपदस्थ होने के बाद मरांडी पार्टी में उपेक्षित महसूस करने लगे थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी हालांकि मरांडी कोडरमा सीट से चुनाव जितने में सफल रहे, जबकि केंद्रीय कैबिनेट मंत्री यशवंत सिन्हा जैसे कई शीर्ष नेता हार गए।

झारखंड विकास मोर्चा 

मुख्यमंत्री पद से अपदस्थ होने के बाद धीरे-धीरे उनका भारतीय जनता पार्टी से मतभेद बढ़ता गया और परिणामस्वरूप बाबूलाल मरांडी ने 2006 में कोडरमा लोकसभा सीट और भाजपा की सदस्‍यता से इस्तीफा दे दिया और 24 सितम्बर 2006 को झारखंड के हजारीबाग में झारखंड विकास मोर्चा(प्रजातांत्रिक) नाम से नई राजनीतिक पार्टी की घोषणा की, जिसमें बीजेपी के 5 विधायक भी पार्टी छोड़कर शामिल हुए। 2006 में कोडरमा लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए और पुनः सांसद निर्वाचित हुए। 2009 के लोकसभा चुनाव में वह कोडरमा लोकसभा सीट से अपनी नई पार्टी जेवीएम के टिकट से चुनाव लड़े और फिर संसद पहुंचे। 2009 झारखंड विधानसभा चुनाव में जेवीएम ने 11 सीटें जीती,  2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में 8 सीटें, लेकिन 11 फरवरी 2015 को जेवीएम के 6 विधायक नवीन जायसवाल(हटिया), अमर कुमार बाउरी (चंदनकियारी), गणेश गंजु(सिमरिया), जानकी यादव(बरकट्ठा), रणधीर सिंह (सारठ) और आलोक कुमार चौरसिया (डाल्टेनगंज) के भाजपा में शामिल हो जाने से जेवीएम के 2 विधायक शेष रह गए। हाल हीं में संपन्न हुवे 2019  विधानसभा चुनाव में जेवीएम 3 सीटें हीं जीत सके।
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     बाबूलाल मरांडी 2014 तथा 2019 में फिर कोडरमा लोकसभा से हीं चुनाव लड़े लेकिन क्रमश रविन्द्र कुमार राय और अन्नपूर्णा देवी से हार गए। मरांडी जी अपने जीवन काल में 5 बार लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए जिसमे 3 बार कोडरमा लोकसभा तथा 2 बार दुमका लोकसभा क्षेत्र शामिल है। 
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श्री मरांडी वर्तमान में 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव में धनवार विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए हैं। पिछले कुछ सप्ताह में उनका झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा है, सम्भवतः फरवरी में वो भाजपा में जेवीएम का विलय कर बीजेपी में खुद सामिल हो सकते हैं। फिलहाल 14 वर्ष बाद पुनः भाजपा में शामिल होने तथा जेवीएम का भाजपा में विलय करने की खबर को लेकर चर्चा में हैं।


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Wednesday, 29 January 2020

जनसंख्या नियंत्रण कानून (Population Control Law) क्यों जरूरी...?


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जनसंख्या नियंत्रण कानून : भारत की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर प्रभावी नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून आवश्यक हो गया है। जनसंख्या नियंत्रण कानून जरूरी है ताकि जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन बना रहे। समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपाय नहीं किये गए तो आने वाले दशकों में देश को इसके भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

      पूरी दुनियां वर्तमान में जिन तीन प्रमुख समस्याओं का सामना कर रही है वो हैं आतंकवाद, प्रदूषण और जनसंख्या विस्फोट। दुर्भाग्य से भारत इन सभी समस्याओं से बुरी तरह पीड़ित है।

भारत की जनसंख्या वृद्धि


     भारत की आबादी 1901 में  23 करोड़ थी, 1950 में बढ़कर 37 करोड़ हो गई, 2000 में 100 करोड़ और अभी 2020 के शुरुआत में अनुमानतः 135 करोड़ पार कर चुकी है। अनुमान है 2061 में 168 करोड़ हो जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ की 'द वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स 2019' रिपोर्ट के मुताबिक 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़ते हुवे दुनियां में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। ऐसे में देश में ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो रही है आज पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से खतरा कम और जनसंख्या विस्फोट का खतरा ज्यादा बढ़ रहा है। भारत के पास पूरी दुनियां के 2.4 प्रतिशत भूमि है, लेकिन जनसंख्या पूरी दुनियां के 18 प्रतिशत है। 
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जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम 


        अनियंत्रित जनसंख्या वृ​द्धि के कारण आज स्वतंत्रता प्राप्ति के 7 दशक बाद भी भारत की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। आर्थिक वृद्धि एवं देश के विकास का पूरा लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा। निरक्षरता एवं कुपोषण की समस्या से छुटकारा नहीं मिल रहा। भुखमरी, निर्धनता, बेकारी, भिक्षावृत्ति तथा अन्य सामाजिक व आर्थिक बुराईयों से छुटकारा तभी मिल सकेगा जब हम अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण रखेंगे, अन्यथा हम विकास एवं प्रगति से होने वाले लाभों से वंचित रह जायेंगे। हमारा देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। अगर गौर करें तो पायेंगे कि जनसंख्या में वृद्धि इन सभी समस्याओं का मूल कारण है। बेरोजगारी हो या भ्रष्टाचार, अराजकता हो या आतंकवाद, निरक्षरता हो या फिर अन्य सामाजिक समस्यायें जनसंख्या कम होने पर यह स्वतः हल हो सकती हैं।
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लम्बी ट्रैफिक जाम का एक दृश्य

        जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम है कि पिछले 4-5 दशकों में बेरोजगारी और कुपोषित लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुई है। बढ़ती बेरोजगारी का आलम ये है की पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में 200 चपरासी पद के लिए आवेदन आमंत्रित किये गए थे जिसके लिए 50 लाख से अधिक लोगों ने आवेदन दिया था। जनसंख्या वृद्धि का असर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि सुविधाओं पर सीधे-सीधे पड़ रहा है। स्कूलों में छात्रों को दाखिला नहीं मिलता, अस्पतालों में मरीजों की ठीक से देखभाल नहीं हो पाती और बसों, रेलगाडियों में भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है। शहरों, महानगरों में सड़कों पर गाड़ियों की लम्बी-लम्बी कतारों के कारण दिन-रात जाम की स्थिति बनी रहती है।
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रेलवे स्टेशन में छात्रों की भारी भीड़(PC : TWITTER) 

पुरूष नसबंदी अभियान        


आजादी के बाद जनसंख्या विस्फोट से निपटना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी। जनसंख्या नियंत्रण के लिए लोगों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करने के लिए  सरकार द्वारा बहुत उपाय किये गए लेकिन परिणाम संतोषजनक नहीं रहा फिर आपातकाल के समय कांग्रेस सरकार द्वारा पुरूष नसबंदी अभियान चलाया गया। जिसमें सभी सरकारी अधिकारियों को साफ निर्देश था कि नसंबदी के लिए तय लक्ष्य को वह समय पर पूरा करें, नहीं तो तनख्वाह रोककर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। परिणामस्वरूप इस दौरान घरों में घुसकर, बसों से उतारकर और लोभ-लालच देकर लोगों की नसबंदी की गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल के भीतर देशभर में 62 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई। इनमें 15-16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक शामिल थे। यही नहीं गलत ऑपरेशन और इलाज में लापरवाही के कारण करीब दो हजार लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। फिर आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस सरकार गिर गई और लोगों को इस जबरन नसबंदी अभियान से राहत मिला। सरकार गिरने के पीछे नसबंदी के फैसले को भी एक बड़ी वजह माना गया। उसके बाद 'हम दो हमारे दो' और 'छोटा परिवार सुखी परिवार' जैसे परिवार नियोजन सम्बंधी सरकारी नारे बहुत लगाए   गए मुफ्त में गर्भ निरोधक दवाएं और कंडोम बाटे गए किन्तु जनसंख्या नियंत्रण दर में कमी लाने के लिए कभी कोई ठोस पहल नहीं की गई। देश में राष्ट्रीय स्तर पर परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में परिवार नियोजन के क़ानून लागू है लेकिन कानून में कड़े प्रावधानों के कमी के कारण यह प्रभावहीन है। 5 दशक पहले चीन में हो रही अन्धाधुन्ध जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए 1979 में चीन में एक बच्चे की नीति लागू की गई थी। लेकिन भारत में कड़े कानून के अभाव में देश की अनियंत्रित जनसंख्या देश के विकास में बाधा बनता रहा है।

बढ़ती आबादी एक राजनीतिक विफलता


वास्तव में देश की अनियंत्रित बढ़ती आबादी राजनीतिक विफलता का ही परिणाम है। जनसंख्या नियंत्रण का सपना ठोस कानून व्यवस्था के बिना पूरा नहीं किया जा सकता है। देश में एक ऐसे कानून की जरूरत है जिससे लोग परिवार नियोजन के लिए बाध्य हों जाय। मौजूदा एनडीए सरकार से देशवासियों को जनसंख्या नियंत्रण कानून के रूप में एक ऐसे कानून की उम्मीद है जो देश की जनसंख्या नियंत्रण के लिए निर्णायक साबित हो। लेकिन ओवैसी जैसे कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदार नेताओं के जनसंख्या नियंत्रण कानून के खिलाफ लगातार बयानबाजी और विरोध से लगता है सरकार के लिए इसे कानून का रूप देना आसान नहीं होगा। ओवैसी जैसे नेता जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम के बारे में सोचे बिना अपने कौम को अंधेरे में रख जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुददों का अपने राजनीतिक फायदे के लिए हमेशा से विरोध करते रहे हैं ताकि दिन-प्रतिदिन मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती रहे और उनका वोट बैंक का फसल लहलहाते रहे। बात हिन्दुओं की कि जाए तो बिना कानून पास हुए भी परिवार नियोजन के मामले में जहां करीब 90 फीसदी हिन्दू एक या दो बच्चों के सिद्धांत पर चल रहे हैं, वहीं मुसलमान अपने धर्म संबंधित धार्मिक मान्यताओं के कारण परिवार नियोजन को धर्म के विरुद्ध मानते हैं। आलम यह है की जिनके घर में खाने के दो वक्त का अनाज नहीं है वो भी अपने वर्तमान और भविष्य का फिक्र किये बगैर बच्चे-दर-बच्चे पैदा किये जा रहे हैं उन्हें न अपने बच्चे के स्वास्थ्य से मतलब है और न ही उनके शिक्षित होने से। जिसके कारण कम हीं उम्र से उनके बच्चों को माता-पिता का सहयोग मिलना बन्द हो जाता है और फिर वही बच्चे शिक्षा, रोजगार और सहयोग के अभाव में लाचारी और बेगारी में कहीं पंचर बनाते, मजदुरी करते तो कभी गलत संगत में पड़ कर चोरी-डकैती करते देखे जाते हैं। ओवैसी जैसे नेता अपने राजनीतिक फायदे के लिए दशकों से मुसलमानों का इस्तेमाल करते आये हैं। वे उन्हें शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवनयापन के लिए प्रेरित करने के बजाय घटिया धार्मिक मान्यताओं में उलझाये रखते हैं ताकि ये अशिक्षित रहे और उनके वोट बैंक बने रहे।

जनसंख्या नियंत्रण कानून पर राज्यसभा में निजी विधेयक पेश।

     जनसंख्या नियंत्रण को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  का नजरिया हमेशा से हीं स्पष्ट रहा है। आरएसएस जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर दशकों से आवाज उठाता रहा है। कई मौकों पर आरएसएस प्रमुख कह चुके हैं की यदि सरकार जनसंख्या नियंत्रण के लिए दो बच्चों की नीति जैसे कोई कानून बनाती है तो संघ उस कानून का समर्थन करेगा। संघ के विचारक और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा द्वारा 12 जुलाई 2019 को राज्यसभा में प्रति दंपति दो बच्चों के मानकों से संबंधित एक निजी विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक में एक परिवार में सिर्फ़ दो बच्चों के होने का ज़िक्र किया गया। इस विधेयक का नाम जनसंख्या विनियमन विधेयक 2019 रखा गया था।

इस विधेयक के कुछ प्रावधान...


दो बच्चे की नीति न मानने वालों को...
लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जाए

नौकरियों में प्राथमिकता ना मिले

लोन लेने पर अधिक ब्याज़ लगे

जमा रकम में कम ब्याज़ मिले

दो बच्चे की नीति मानने वाले को...

बैंक डिपॉज़िट में ज़्यादा ब्याज़ मिले

बच्चों को शिक्षा में प्राथमिकता मिले
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प्रो. राकेश सिन्हा एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए(PC: TWITTER)

अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि विकास में बाधक


      विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए जनसंख्या पर नियन्त्रण करना अतिआवश्यक बन पड़ा है। हमारी आबादी में अभी भी हर दिन पचास हजार की वृद्धि हो रही है। इतनी बड़ी जनसंख्या को भोजन मुहैया कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खाद्यान्न उत्पादन प्रतिवर्ष उस अनुपात में बढ़े, वर्तमान में ये सम्भव नहीं है जिसके कारण दूसरे देशों के प्रति हमारी खाद्यान्न निर्भरता बढ़ती रही है जो देश के विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। अनियंत्रित जनसंख्या देश में अर्थव्यवस्था, सामाजिक समरसता और संसाधन का संतुलन बिगाड़ रहा है। जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन बना रहे इसके लिए देश में जनसंख्या नियंत्रण अति आवश्यक बन पड़ा है एक आंकड़े बताते हैं पिछले सात दशकों में भारत की जनसंख्या में 366 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं इस अवधि में अमेरिका की जनसंख्या में सिर्फ 113 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

        2019 में दूसरी बार एनडीए सरकार बनने के बाद लगातार केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक पर प्रतिबंध, कश्मीर से धारा 370 का खात्मा और नागरिकता संशोधन कानून जैसे कई निर्णायक कदम उठाये जा चुके हैं अब भारतीय जनता को उम्मीद है सरकार जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में ठोस पहल करते हुवे इसके लिए कोई प्रभावी कानून बनाएंगी।








Friday, 17 January 2020

बाबूलाल मरांडी और भाजपा : कौन किसके खेवनहार


बाबूलाल मरांडी और भाजपा : कौन किसके खेवनहार? क्या कर पाएंगे एक दूसरे की नैया पार?

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भाजपा से अलग होने के बाद बाबूलाल मरांडी जी का राजनीतिक जीवन ढलता चला गया अब वो फिर भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं। भाजपा को भी झारखंड में जरूरी है एक ऐसे नेता की जो भाजपा के राज्य में बिगड़ते खेल को संभाल सके। दोनो एक दूसरे में अपनी डूबती नैया के नए खेवैया को देख रहे हैं अब समय बतायेगा कौन किसके खेवनहार बनते हैं। 


बाबूलाल मरांडी एक ऐसा नाम जिनका जिक्र किए बगैर झारखंड का इतिहास लिखना सम्भव हीं नहीं है। दशकों के राजनीतिक संघर्ष के बाद जब 15 नवम्बर 2000 को झारखंड भारत के 29वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया तो बाबूलाल मरांडी को झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुवा। एक शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत कर झारखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले श्री बाबूलाल मरांडी जी किसी परिचय  के मोहताज नहीं हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा हुवा रहा है।
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फ़ोटो साभार : ट्विटर


      1998 से लेकर 2003 तक के समय को बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक जीवन का गोल्डन पीरियड कहा जा सकता है। भाजपा से अलग होकर नई पार्टी का निर्माण उनके लिए बढ़िया निर्णय साबित नहीं हुवा। शायद उन्हें लगा होगा वे झारखंड की राजनीति के ममता बनर्जी साबित होंगे और उनकी पार्टी एक दिन तृणमूल कांग्रेस जैसी सफलता हासिल करेगी लेकिन किसी भी विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के नतीजे को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। उन्हें जेवीएम को झारखंड की राजनीति में शीर्ष पर पहुँचाने के लिए कुछ अच्छे सहयोगी की जरूरत थी लेकिन इसके विपरीत उनके विधायक पार्टी बदलते रहे। आजकल झारखंड की राजनीति में बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने तथा जेवीएम के भाजपा में विलय करने के निर्णय की खबर चर्चा में बना हुवा है। लोगों को यकीन नहीं हो रहा है ये वही बाबूलाल हैं जो एक समय कहा करते थे भाजपा में शामिल होने से अच्छा कुतुबमीनार से कूद जाना पसंद करूँगा। हालांकि बाबूलाल मरांडी अपने जीवन में दशकों तक भाजपा के पितृ संगठनों से जुड़े रहे हैं तथा भाजपा से अलग होने के बाद भी इन संगठनों तथा भाजपा पर कभी तीखे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किये हैं। भाजपा की स्थिति भी अब झारखंड में अच्छी नहीं रही। रघुवर दास झारखंड के पहले मुख्यमंत्री हुए जो अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा कर सके फिर भी 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा मात्र 25 सीटों पर सिमट कर रह गए। खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने विधानसभा क्षेत्र जमशेदपुर पूर्वी सीट से भाजपा के हीं बागी सरयू राय से चुनाव हार गए।
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 बहरहाल जो भी हो 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा के 28 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में 26 हारने के बाद भाजपा को राज्य में जरूरत है एक मजबूत आदिवासी नेता की तथा 14 सालों से भाजपा से अलग होने के वाबजूद भी अच्छी सफलता हाथ नहीं लगने वाले बाबूलाल को जरूरत है एक नई  शुरूआत की। जेवीएम ही एकमात्र पार्टी है जो 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव में सभी 81 सीटों से लड़ी, उसके वावजूद मात्र तीन सीटें प्राप्त हुई। झारखंड के मौजूदा राजनीतिक परिवेश में बाबूलाल तथा भाजपा दोनों को जरूरत है एक खेवनहार की। अब ये देखना दिलचस्प होगा कौन किसके खेवनहार बनते है। कहते हैं डूबने वाले को तिनके का सहारा हीं बहुत अब भविष्य में पता चलेगा दोनों में से कौन किसके लिए तिनका बन पाते हैं।
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एक रैली को संबोधित करते श्री मरांडी(फ़ोटो: ट्विटर)
 कभी भाजपा में शामिल होने की बात पूछने पर भाजपा और जहर में से जहर को चुनना पसंद करूँगा जैसी बात करने वाले बाबूलाल मरांडी जी की भाजपा में कैसी रहेगी दूसरी पारी अब ये तो वक्त हीं बताएगा। फिलहाल बगैर कोई पद लिए भाजपा में शामिल होने की बात उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेताओं को बता दी है। मरांडी ने भाजपा से कहा है कि वे भाजपा में शामिल तो होंगे, पर न तो विधायक दल के नेता का दायित्व लेंगे और न ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे। वे सामान्य कार्यकर्ता के रूप में भाजपा में शामिल होंगे। कभी भाजपा को संथाल क्षेत्रों में जन-जन तक पहुँचाने वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी 14 वर्षों बाद फिर से भाजपा में नई पारी की शुरुआत करेंगे। कभी आरएसएस के निष्ठावान और विश्वसनीय स्वयंसेवक और समर्पित भाजपाई रहे बाबूलाल मरांडी ने वर्ष 2006 में  भाजपा में उपेक्षित महसूस कर झारखंड विकास मोर्चा(प्रजातांत्रिक) नाम से नई पार्टी बना ली थी। इसके बाद वे लगातार दो बार कोडरमा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने। हालांकि उनकी पार्टी किसी भी विधानसभा चुनाव में अच्छा नहीं कर पाई। उनके कई विधायकों ने मौकों पर पार्टी बदल ली। 2019 में झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव में श्री मरांडी धनवार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए हैं।



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◆  झारखण्ड में भाजपा के हार की वजह


Wednesday, 8 January 2020

टोक्यो ओलम्पिक 2020 से उम्मीदें और खेलों में भारत के पिछड़ेपन का कारण


टोक्यो ओलम्पिक 2020 में भारत


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टोक्यो ओलम्पिक 2020 : विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलम्पिक का आयोजन इस बार टोक्यो में होने जा रहा है। टोक्यो ओलम्पिक 2020 के आयोजन में अब 6 माह शेष है। पिछले कुछ सालों में भारत की स्थिति सभी खेलों में सुधरी है। टोक्यो ओलम्पिक से भारत को बहुत उम्मीदें है। अब देखना है ये उम्मीदें रंग लाती हैं? आखिर क्या है भारत के खेलों में पिछड़ेपन का कारण?


ओलम्पिक (olympic) विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता है। ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता का प्रारंभ ओलंपिया में होने के कारण इन्हें ओलंपिक खेल नाम दिया गया। इन खेलों के प्रतीक चिन्ह में लाल, नीले, हरे, पीले और काले रंगों के पांच वलय दर्शाए गए हैं जो पांच महाद्वीपों अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक चार साल के अंतराल में आयोजित होने वाले दुनियां के इस सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता का आयोजन 2020 में होने जा रहा है, इस खेल महाकुंभ के शुभारंभ में 200 से भी कम दिन शेष बचे हैं। आधिकारिक तौर पर आधुनिक ओलंपिक के इस XXXII ग्रीष्मकालीन ओलम्पियाड की मेजबानी इस बार जापान कर रहा है। अन्तराष्ट्रीय योजनाबद्ध बहु-खेल प्रतियोगिता के इस महासमर का आयोजन 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 के बीच जापान के टोक्यो शहर होने जा रहा है, जिसमें 200 से अधिक देशों के 10 हजार से अधिक खिलाड़ियों के भाग लेने का अनुमान है।

टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए जो दो करेक्टर्स शुभंकर के रूप में अंतिम रूप से चयनित किए गए उनके नाम हैं ‘मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'। ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक का शुभंकर है मिराइतोवा। यह मिराई व तोवा शब्दों से बना है जिसका अर्थ होता है अनन्त व शाश्वत। टोक्यो पैरालम्पिक 2020 का शुभंकर है सोमाइटी, यह एक  पिंक चेक वाला शुभंकर है।
Tokyo Olympic 2020 mascot
मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'


ओलम्पिक में भारत का इतिहास


भारत ने ओलम्पिक में पहली बार 1900 में फ्रांस में हुए द्वितीय ओलम्पिक में भाग लिया, इसमें भारत की ओर से भाग लेते हुए नार्मन प्रिजार्ड (आँग्ल इंडियन) ने एथलेटिक्स स्पर्धा में दो रजत पदक प्राप्त किया। लेकिन फिर 1920 तक किसी टीम प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लिया। 1920 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में देश ने पहली बार एक टीम भेजी और उसके बाद से हर ग्रीष्मकालीन ओलपिंक खेलों में भाग लिया है। टोक्यो ओलंपिक 2020 शुरू होने से पहले भारत के खाते में अभी तक कुल 28 ओलम्पिक पदक हैं। 1920 से 1980 के बीच हुए बारह ओलंपिक खेलों में लम्बे समय तक भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम का दबदबा बना रहा। इस बीच हुए बारह ओलंपिक में से भारत ने ग्यारह में पदक जीते जिनमें 8 स्वर्ण पदक थे, इसमें 1928-1956 तक छह स्वर्ण पदक लगातार जीते थे। बीजिंग ओलम्पिक 2008 में अभिनव बिंद्रा द्वारा 10 मीटर एयर रायफल (निशानेबाजी) में जीता गया स्वर्ण पदक किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का पहला स्वर्ण पदक है।
Abhinav bindra, Beijing Olympic 2008, gold medalist
अभिनव बिंद्रा

ओलम्पिक इतिहास में भारत के लिए लंदन ओलम्पिक 2012 सबसे सफल रहा जिसमें भारत ने पहली बार 6 ओलम्पिक पदक (3 रजत, 3 कांस्य) जीता और पदक तालिका में 55वां स्थान सुनिश्चित किया। पिछले 2016 के रियो ओलम्पिक में भारत की ओर से 118 सदस्यीय टीम प्रतिस्पर्धा में शामिल हुए जिसमें कुल दो पदक (एक रजत, एक कांस्य) प्राप्त हुए। पिछले कुछ ओलम्पिक में कुश्ती, निशानेबाजी, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, बैडमिंटन जैसे कुछ खेलों में भारत अच्छा करता रहा है और जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स जैसे कुछ खेलों में अच्छे प्रदर्शन के कारण टोक्यो ओलम्पिक में पदकों के संख्या में बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ी है।
ओलम्पिक प्रतीक चिन्ह, Olympic



आखिर क्यों...?


70 साल से अधिक हो गए है देश को आजाद हुए आज हमारा देश शिक्षा हो या विज्ञान या फिर अर्थव्यवस्था हर क्षेत्र में लगातार तरक्की कर रहा है। लेकिन इतनी जनसंख्या के बावजूद खेल प्रतिस्पर्धाओं में हमारी स्थिति सुधरी नहीं है, ओलंपिक हो या कॉमनवेल्थ हमारी स्थिति बहुत प्रशंसनीय नहीं रही है। इतनी जनसंख्या के बावजूद भी आखिर क्यों भारत खेल प्रतिस्पर्धाओं में इतना पिछड़ा हुवा है, आखिर क्यों इतने योग्य खिलाडी नहीं तैयार कर पाते हम जो अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में भारत को गौरवान्वित कर सके। दुनियां में दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं हम, फिर भी दुनियां के शीर्ष खेल के प्रतिस्पर्धाओं में हम पदक तालिका सूचि में सम्मानजनक जगह नहीं बना पाते। 135 करोड़ की आबादी के लगभग हम पहुँच गए है फिर भी खेलों में हमारी स्थिति कितनी दयनीय है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की जमैका, क्यूबा, क्रोएशिया, नीदरलैंड, हंगरी, केन्या, स्पेन, दक्षिण कोरिया जैसे दर्जनों देश ओलम्पिक पदक तालिका में भारत से ऊपर रहते हैं उनमें से अधिकतर देशों के न सिर्फ आबादी और क्षेत्रफल भारत से कम है बल्कि आर्थिक दृष्टि से भारत से बहुत पिछड़े हैं।


खेलों में पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?


खेलों में भारत के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार तो बहुत कारक हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है "राजनीति"।  भारत में सभी खेल संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर राजनेता बैठे हुए हैं जिनको न उस खेल की समझ है और न हीं उसका उस खेल में कोई इतिहास रहा है, उनको सिर्फ अपनी जेबें भरने से मतलब है। क्षणिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा साधने के लिए ऐसे लोगों को खेल संगठनों का अध्यक्ष और सचिव नियुक्त कर दिया जाता है जिन्हें खीलाड़ियों को कोई सुविधा उपलब्ध कराने में उनकी खास दिलचस्पी नहीं रहती। अगर इन संगठनों में नेताओं को हटाकर पूर्व खिलाड़ियों को रखें तो हर खेल की स्थिति में सुधार होगा, क्योंकि एक खिलाड़ी की मानसिकता और जरूरतों को उस दौर से गुजर चुका या उससे लगाव रखने वाला व्यक्ति बेहतर समझ सकता है।
        दूसरा कारण है खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता। आजादी के बाद से हीं कभी भी सरकारें खेल के प्रति गंभीर नहीं रही है। आज स्थिति ऐसी हो गई है एक अभिभावक को विश्वास नही होता की खेल में भी उसके बच्चे का कॅरियर बन सकता है। एक सर्वेे के मुताबिक भारत में दस लोगों में से केवल एक भारतीय युवा खेल को करियर बनाने के लिए इच्छुक है। ऐसा क्यों है? इसके जवाब में लोगों ने बताया कि वो खेल को एक ऐसी गतिविधि के रूप में मानते हैं जो स्कूल तक ही सीमित है और इसमें आगे कोई भविष्य नहीं। क्योंकि देश में स्पोर्ट्स ट्रेनिंग महँगे हैं और आसानी से उपलब्ध नहीं है और सबसे बड़ा कारण उन्हें खेल में अपना कॅरियर सुरक्षित नहीं लगता। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके कुछ खिलाड़ियों को आर्थिक तंगी में अपना मेडल बेचता देख युवाओं को खेल में एक सुरक्षित भविष्य नजर नहीं आता है। सरकार को एक खिलाड़ी के बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए ऐसा कुछ करने की जरूरत है जो युवाओं को खेल-कॅरियर की असुरक्षा भावना को भुलाकर खेल के प्रति आकर्षित करे। स्पोर्ट्स-बजट के नाम पर जितना पैसा सरकार हर साल देती है उससे प्रखंड और जिला स्तर पर स्पोर्ट्स सेंटर बनाने के साथ हीं देश में सुविधा और आर्थिक तंगी के कारण अपना खेल में सुधार नहीं कर पा रहे खिलाड़ियों को ढूंढकर तराशने में लगाया जाय तो हमारी स्थिति सुधर सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार को खेल बजट बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि विश्व स्तर के खिलाडी तैयार करने के लिए खिलाड़ियों को अच्छी सुविधाओं के साथ-साथ अच्छे तकनीक की भी जरूरत है। युवाओं को खेल के प्रति आकर्षित करने के लिए ग्राम-पंचायत स्तर पर छोटे-छोटे स्पोर्ट्स सेंटर बनाने होंगे जिससे बचपन से ही युवाओं का खेल के प्रति आकर्षण बढ़े और दिन प्रतिदिन उसका खेल निखरता जाए। स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएं जिससे बच्चे खेल को करियर के रूप में लेने की सोचें।
     खेलों में भारत के पिछड़ेपन के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे भारत में क्रिकेट को जितना बढ़ावा दिया जाता रहा है समान रूप से दूसरे खेलों को भी दिया जाता तो शायद आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की खेल प्रतिस्पर्धाओं में स्थिति और बेहतर होता।
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हर जगह सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट का प्रचार किया जाता है। क्रिकेट में भारत की स्थिति मजबूत होने का एक कारण इस खेल में कम उपकरण की जरूरत होना भी है बच्चे बचपन से हीं एक बल्ला और एक गेंद लेकर गली-मोहल्ले में कहीं भी शुरू हो जाते हैं लेकिन यदि कोई तैराकी, टेनिस, बैडमिंटन में कॅरियर बनाना चाहता है तो कोई प्रोत्साहन हीं नहीं मिलता।


खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना

भारत में खेलों की स्थिति व स्तर में सुधार के लिए भारत सरकार द्वारा लाया गया खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना बहुत हीं प्रसंशनीय है। हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, किन्तु खिलाड़ियों को उचित व्यवस्था और बेहतर तकनीक के अभाव में अच्छा प्रदर्शन करना काफी चुनौतियों भरा होता है। देश में खेलों को बढावा देने और नई प्रतिभाओं को तलाशने के उद्देश्य से भारत सरकार के खेल मंत्री श्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा राजीव गांधी खेल योजना, शहरी खेल संरचना योजना, ग्रामीण खेल योजना और राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज योजना को मिलाकर इनके स्थान पर ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम योजना पेश किया गया है।

इस खेल कार्यक्रम योजना के तहत सरकार ने 10 साल की उम्र से ही प्रतिभावान खिलाड़ी बच्चों का पोषण करने का फैसला किया है। सरकार हर साल 1000 बच्चों को चयन करेगी और उन्हें अगले 8 साल तक 5 लाख रुपए सालाना छात्रवृत्ति देगी ताकि वह अपने खर्चे उठा सकें और केवल खेलों पर ही ध्यान दे सकें।
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खेलो इंडिया के एक कार्यक्रम में खेल मंत्री किरण रिजिजू

इस कार्यक्रम का लक्ष्य देश में 20 विश्वविद्यालयों को खेल की उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में बढ़ावा देना है ताकि प्रतिभाशाली खिलाड़ी अपनी शिक्षा के साथ समझौता किए बिना प्रतियोगी खेलों में आगे बढ़ने में सक्षम हो पाए। इस योजना में आवेदन करने के लिए उम्र 8 वर्ष से 12 वर्ष के बीच होनी चाहिए। खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना की रूपरेखा से लगता है यदि सरकार योजना को सही से क्रियान्वित करने में सफल रहती है तो आगामी वर्षों में यह योजना भारत में खेल के विकास में एक क्रांति साबित होगी।
     बहरहाल देश मे खेलों की वर्तमान स्थिति जो भी हो उम्मीद है टोक्यो ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी अपने अच्छे प्रदर्शन से अधिक से अधिक संख्या में पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करेंगे...




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Saturday, 4 January 2020

दलितों का धर्म-परिवर्तन और सिमटता हिन्दू धर्म


दलितों का धर्म-परिवर्तन और सिमटता हिन्दू धर्म

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जातिवाद और  छुवाछुत  के  नाम पर  दलितों  का दशकों  से  धर्म-परिवर्तन जारी है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दलित वोटों की राजनीति ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया है। दशकों से  हो  रहे  दलितों  के  धर्म-पलायन  के  कारण  कुछ  क्षेत्रों  में  हिन्दू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं।
       हिन्दू धर्म को दुनियां का सबसे प्राचीन धर्म है, कहते हैं एक समय था जब पूरे विश्व में हिन्दू धर्म फैला हुवा था फिर ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में जैन, बौद्ध, 16वीं ई में सिख हमसे अलग हो गए और अब 20 वीं और 21वीं सदी में दलित हमसे अलग हो रहे है। दलितों को लगने लगा है कि हिंदू धर्म से बाहर निकलना उनके लिए बेहतर रास्ता हो सकता है आखिर इस सब सबका जिम्मेदार कौन है?
           हिन्दू समाज को श्रम विभाजन के आधार पर चार वर्णों में विभक्त किया गया था। किन्तु कालान्तर में इससे हजारों जातियाँ बन गयीं। श्रम विभाजन के आधार पर विभक्त समाज धीरे-धीरे जन्म के आधार पर विभक्त होती गई, जिससे धीरे-धीरे समाज मे उच्च नीच की भावना पनपने लगी, लोग जातिगत भेदभाव के शिकार होने लगे, छुवाछुत की भावना समाज मे जहर के जैसे घुल गई और फिर शुरू हुआ धीरे-धीरे वंचितों, कमजोरों और दलितों का शोषण।  

डॉ अम्बेडकर की दीक्षा और दलितों के धर्म-परिवर्तन की शुरुआत

         डॉ अम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की। 
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बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर

   बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जीवन भर छुवाछुत, जातिगत भेदभाव से पीड़ित रहे और जीवनपर्यंत इन सामाजिक कुरीतियों से लड़ते रहे, अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म  स्वीकार कर लिया। नागपुर के दीक्षा भूमि में जब 14 अक्टूबर 1956 को वे बौद्ध धर्म का दीक्षा ले रहे थे तो बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले वो अकेले नही थे उनके साथ लगभग तीन लाख दलित भी थे जो बाबा साहेब के विचारों से प्रेरित होकर और अपने ऊपर हो रहे जुल्मों से तंग आकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले रहे थे। अगले दो-तीन दिनों में बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर 8 लाख से अधिक लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन दिनों को इतिहास सिर्फ इसलिए याद नही रखेगा की लाखों लोग बौद्ध बने थे बल्कि इसलिए भी याद रखेगा की लाखों हिन्दुओ ने हिन्दू धर्म का त्याग किया था। एक बौद्ध के रूप में बाबा साहब मात्र एक महीना और 22 दिन ही जी सके लेकिन इस अल्प समय में वे जहाँ भी गए दलितों को हिन्दू धर्म त्यागने के लिए प्रेरित करते रहे परिणामस्वरूप आज भारत के कुल धर्मपरावर्तित बौद्धों की संख्या लगभग 73 लाख हैं, उनमें से लगभग 90% महाराष्ट्र में हैं। उस समय से जो दलितों का हिन्दू धर्म त्यागने का सिलसिला चला है दलितों के वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं के कारण बढ़ता चला जा रहा है। 

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दीक्षा भूमि, नागपुर

दिन प्रतिदिन दलित हिन्दू धर्म से दूर होते जा रहे है, फेसबुक के कुछ दलित समूहों या फिर यूट्यूब के कुछ दलित समर्थित चैनलों के पोस्ट और वीडियो को आप देखेंगे तो आपको आश्चर्य होगा दिन-प्रतिदिन इनलोगो के मन मे हिन्दू धर्म के प्रति कितनी नफरत भरते जा रही है।
              मानव सभ्यता 21वीं शताब्दी में पहुँच गई है, आज मानव मंगल ग्रह पर बसने के सपने देख रहे हैं। आज विश्व में भारत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आया है।भारत में पिछले 4-5 दशकों में साक्षरता दर में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है फिर भी समाज में जातिवाद और छुवाछुत की भावना खत्म नहीं हो पा रही है। वसुधैव-कुटुम्बकम का संदेश देने वाले हिन्दू धर्म में कुछ मानसिक रूप से बीमार हिंदुओ के कारण आये दिन देश में दलितों के प्रति अत्याचार की खबरें सुनने को मिलती रहती है।

दलितों पर अत्याचार कब रुकेंगे?

            आखिर क्यों गुजरात के उना में दलित युवकों को बेरहमी से पीटे जाते हैं और लंबी मूंछें रखने नाम में ‘सिंह’ लगाने या घुड़सवारी करने पर कुछ तथाकथित उच्च जातियों के ठेकेदारों को तकलीफ होने लगता है। क्यों कहीं दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर तिरंगा न फहराने दिया जाता है, क्यों कहीं मिडडे मील के वक्त दलित छात्रों को अलग बैठाये जाते हैं। दलित युवक के शादी में घोड़ी चढ़ने पर क्यों किसी को आपत्ति होता है। दलित युवक संजय जाटव आखिर कसूर क्या था जो उनको शादी में घोड़ी चढ़ने के लिए पुलिस-कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। 
            सवाल बहुत हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है क्या कभी इन नफरतों का अंत हो पायेगा? हज़ारों वर्षों से दलित वर्ग पर अत्याचार होते आए हैं आज भी हो रहे हैं, ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे तथाकथित उच्च समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न है। इस अत्याचार के कारण प्रति वर्ष हजारों दलित हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपना रहे हैं। कभी पूरी दुनियां में फैला हिन्दू धर्म, आज अपने मूल देश में ही सिमटता जा रहा है। परम्परागत उच्च वर्ग द्वारा दलितों पर बेक़सूरी एवं बेरहमी से किए जा रहे अत्याचार और दलितों का धर्म-परिवर्तन कैसे रोका जाए, वर्तमान में तो यही हिन्दू धर्म की मूल समस्या है।

वसुधैव-कुटुम्बकम हीं हिंदुत्व की मूल भावना


            पिछले कुछ दशकों में दलितों के धर्म-पलायन के कारण हिंदुओ की आबादी पर काफी प्रभाव पड़ा है। कई क्षेत्रों में हिन्दू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं, उन क्षेत्रों में कुछ धर्म विशेष लोगों की बहुलता के कारण आये दिन बचे-खुचे हिंदुओ को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।  अभी समय है जातिवाद और छुवाछुत की भावना को भुलाकर एकजुट होने का। हिन्दू धर्म की मूल भावना वसुधैव-कुटुम्बकम को आत्मसात कर हिंदुत्व की विचारधारा को विस्तार करने का। अपने अंदर दूसरों के प्रति प्यार और सद्भाव समाहित करने का जिससे जो हिन्दू धर्म त्याग कर दूसरे धर्म अपना चुके है वो घर वापसी को प्रोत्साहित हो। ये तभी संभव हो सकेगा जब हिन्दू धर्म के सभी संगठन एकजुट होकर आगे आएंगे और लोगों को उन हिन्दू-धर्मद्रोहीयों को चिन्हित कर सजा दिलाने को प्रोत्साहित करेंगे जिनके नफरतों से तंग आकर कुछ हिन्दू धर्म-परिवर्तन कर लेते हैं।
         पहले जैन, बौद्ध, सिख अलग हुवे, अब दलित अलग हो रहे हैं, नफरतों का सिलसिला नहीं थमा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू अपने देश में हीं अल्पसंख्यक बनकर रह जायेंगे। हमें एकजुट होकर इस नफरत के खिलाफ जंग लड़नी होगी ताकि बचा रहे हिन्दू धर्म।


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