खबरों की समीक्षा, सच्चाई और जनहित ख़बरों के लिए Jantantra.net पर आपका स्वागत है...

Wednesday, 8 January 2020

टोक्यो ओलम्पिक 2020 से उम्मीदें और खेलों में भारत के पिछड़ेपन का कारण


टोक्यो ओलम्पिक 2020 में भारत


Tokyo olympic 2020, टोक्यो ओलंपिक 2020, olympic


टोक्यो ओलम्पिक 2020 : विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलम्पिक का आयोजन इस बार टोक्यो में होने जा रहा है। टोक्यो ओलम्पिक 2020 के आयोजन में अब 6 माह शेष है। पिछले कुछ सालों में भारत की स्थिति सभी खेलों में सुधरी है। टोक्यो ओलम्पिक से भारत को बहुत उम्मीदें है। अब देखना है ये उम्मीदें रंग लाती हैं? आखिर क्या है भारत के खेलों में पिछड़ेपन का कारण?


ओलम्पिक (olympic) विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता है। ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता का प्रारंभ ओलंपिया में होने के कारण इन्हें ओलंपिक खेल नाम दिया गया। इन खेलों के प्रतीक चिन्ह में लाल, नीले, हरे, पीले और काले रंगों के पांच वलय दर्शाए गए हैं जो पांच महाद्वीपों अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक चार साल के अंतराल में आयोजित होने वाले दुनियां के इस सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता का आयोजन 2020 में होने जा रहा है, इस खेल महाकुंभ के शुभारंभ में 200 से भी कम दिन शेष बचे हैं। आधिकारिक तौर पर आधुनिक ओलंपिक के इस XXXII ग्रीष्मकालीन ओलम्पियाड की मेजबानी इस बार जापान कर रहा है। अन्तराष्ट्रीय योजनाबद्ध बहु-खेल प्रतियोगिता के इस महासमर का आयोजन 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 के बीच जापान के टोक्यो शहर होने जा रहा है, जिसमें 200 से अधिक देशों के 10 हजार से अधिक खिलाड़ियों के भाग लेने का अनुमान है।

टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए जो दो करेक्टर्स शुभंकर के रूप में अंतिम रूप से चयनित किए गए उनके नाम हैं ‘मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'। ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक का शुभंकर है मिराइतोवा। यह मिराई व तोवा शब्दों से बना है जिसका अर्थ होता है अनन्त व शाश्वत। टोक्यो पैरालम्पिक 2020 का शुभंकर है सोमाइटी, यह एक  पिंक चेक वाला शुभंकर है।
Tokyo Olympic 2020 mascot
मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'


ओलम्पिक में भारत का इतिहास


भारत ने ओलम्पिक में पहली बार 1900 में फ्रांस में हुए द्वितीय ओलम्पिक में भाग लिया, इसमें भारत की ओर से भाग लेते हुए नार्मन प्रिजार्ड (आँग्ल इंडियन) ने एथलेटिक्स स्पर्धा में दो रजत पदक प्राप्त किया। लेकिन फिर 1920 तक किसी टीम प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लिया। 1920 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में देश ने पहली बार एक टीम भेजी और उसके बाद से हर ग्रीष्मकालीन ओलपिंक खेलों में भाग लिया है। टोक्यो ओलंपिक 2020 शुरू होने से पहले भारत के खाते में अभी तक कुल 28 ओलम्पिक पदक हैं। 1920 से 1980 के बीच हुए बारह ओलंपिक खेलों में लम्बे समय तक भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम का दबदबा बना रहा। इस बीच हुए बारह ओलंपिक में से भारत ने ग्यारह में पदक जीते जिनमें 8 स्वर्ण पदक थे, इसमें 1928-1956 तक छह स्वर्ण पदक लगातार जीते थे। बीजिंग ओलम्पिक 2008 में अभिनव बिंद्रा द्वारा 10 मीटर एयर रायफल (निशानेबाजी) में जीता गया स्वर्ण पदक किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का पहला स्वर्ण पदक है।
Abhinav bindra, Beijing Olympic 2008, gold medalist
अभिनव बिंद्रा

ओलम्पिक इतिहास में भारत के लिए लंदन ओलम्पिक 2012 सबसे सफल रहा जिसमें भारत ने पहली बार 6 ओलम्पिक पदक (3 रजत, 3 कांस्य) जीता और पदक तालिका में 55वां स्थान सुनिश्चित किया। पिछले 2016 के रियो ओलम्पिक में भारत की ओर से 118 सदस्यीय टीम प्रतिस्पर्धा में शामिल हुए जिसमें कुल दो पदक (एक रजत, एक कांस्य) प्राप्त हुए। पिछले कुछ ओलम्पिक में कुश्ती, निशानेबाजी, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, बैडमिंटन जैसे कुछ खेलों में भारत अच्छा करता रहा है और जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स जैसे कुछ खेलों में अच्छे प्रदर्शन के कारण टोक्यो ओलम्पिक में पदकों के संख्या में बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ी है।
ओलम्पिक प्रतीक चिन्ह, Olympic



आखिर क्यों...?


70 साल से अधिक हो गए है देश को आजाद हुए आज हमारा देश शिक्षा हो या विज्ञान या फिर अर्थव्यवस्था हर क्षेत्र में लगातार तरक्की कर रहा है। लेकिन इतनी जनसंख्या के बावजूद खेल प्रतिस्पर्धाओं में हमारी स्थिति सुधरी नहीं है, ओलंपिक हो या कॉमनवेल्थ हमारी स्थिति बहुत प्रशंसनीय नहीं रही है। इतनी जनसंख्या के बावजूद भी आखिर क्यों भारत खेल प्रतिस्पर्धाओं में इतना पिछड़ा हुवा है, आखिर क्यों इतने योग्य खिलाडी नहीं तैयार कर पाते हम जो अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में भारत को गौरवान्वित कर सके। दुनियां में दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं हम, फिर भी दुनियां के शीर्ष खेल के प्रतिस्पर्धाओं में हम पदक तालिका सूचि में सम्मानजनक जगह नहीं बना पाते। 135 करोड़ की आबादी के लगभग हम पहुँच गए है फिर भी खेलों में हमारी स्थिति कितनी दयनीय है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की जमैका, क्यूबा, क्रोएशिया, नीदरलैंड, हंगरी, केन्या, स्पेन, दक्षिण कोरिया जैसे दर्जनों देश ओलम्पिक पदक तालिका में भारत से ऊपर रहते हैं उनमें से अधिकतर देशों के न सिर्फ आबादी और क्षेत्रफल भारत से कम है बल्कि आर्थिक दृष्टि से भारत से बहुत पिछड़े हैं।


खेलों में पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?


खेलों में भारत के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार तो बहुत कारक हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है "राजनीति"।  भारत में सभी खेल संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर राजनेता बैठे हुए हैं जिनको न उस खेल की समझ है और न हीं उसका उस खेल में कोई इतिहास रहा है, उनको सिर्फ अपनी जेबें भरने से मतलब है। क्षणिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा साधने के लिए ऐसे लोगों को खेल संगठनों का अध्यक्ष और सचिव नियुक्त कर दिया जाता है जिन्हें खीलाड़ियों को कोई सुविधा उपलब्ध कराने में उनकी खास दिलचस्पी नहीं रहती। अगर इन संगठनों में नेताओं को हटाकर पूर्व खिलाड़ियों को रखें तो हर खेल की स्थिति में सुधार होगा, क्योंकि एक खिलाड़ी की मानसिकता और जरूरतों को उस दौर से गुजर चुका या उससे लगाव रखने वाला व्यक्ति बेहतर समझ सकता है।
        दूसरा कारण है खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता। आजादी के बाद से हीं कभी भी सरकारें खेल के प्रति गंभीर नहीं रही है। आज स्थिति ऐसी हो गई है एक अभिभावक को विश्वास नही होता की खेल में भी उसके बच्चे का कॅरियर बन सकता है। एक सर्वेे के मुताबिक भारत में दस लोगों में से केवल एक भारतीय युवा खेल को करियर बनाने के लिए इच्छुक है। ऐसा क्यों है? इसके जवाब में लोगों ने बताया कि वो खेल को एक ऐसी गतिविधि के रूप में मानते हैं जो स्कूल तक ही सीमित है और इसमें आगे कोई भविष्य नहीं। क्योंकि देश में स्पोर्ट्स ट्रेनिंग महँगे हैं और आसानी से उपलब्ध नहीं है और सबसे बड़ा कारण उन्हें खेल में अपना कॅरियर सुरक्षित नहीं लगता। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके कुछ खिलाड़ियों को आर्थिक तंगी में अपना मेडल बेचता देख युवाओं को खेल में एक सुरक्षित भविष्य नजर नहीं आता है। सरकार को एक खिलाड़ी के बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए ऐसा कुछ करने की जरूरत है जो युवाओं को खेल-कॅरियर की असुरक्षा भावना को भुलाकर खेल के प्रति आकर्षित करे। स्पोर्ट्स-बजट के नाम पर जितना पैसा सरकार हर साल देती है उससे प्रखंड और जिला स्तर पर स्पोर्ट्स सेंटर बनाने के साथ हीं देश में सुविधा और आर्थिक तंगी के कारण अपना खेल में सुधार नहीं कर पा रहे खिलाड़ियों को ढूंढकर तराशने में लगाया जाय तो हमारी स्थिति सुधर सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार को खेल बजट बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि विश्व स्तर के खिलाडी तैयार करने के लिए खिलाड़ियों को अच्छी सुविधाओं के साथ-साथ अच्छे तकनीक की भी जरूरत है। युवाओं को खेल के प्रति आकर्षित करने के लिए ग्राम-पंचायत स्तर पर छोटे-छोटे स्पोर्ट्स सेंटर बनाने होंगे जिससे बचपन से ही युवाओं का खेल के प्रति आकर्षण बढ़े और दिन प्रतिदिन उसका खेल निखरता जाए। स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएं जिससे बच्चे खेल को करियर के रूप में लेने की सोचें।
     खेलों में भारत के पिछड़ेपन के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे भारत में क्रिकेट को जितना बढ़ावा दिया जाता रहा है समान रूप से दूसरे खेलों को भी दिया जाता तो शायद आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की खेल प्रतिस्पर्धाओं में स्थिति और बेहतर होता।
Cricket, bat, ball, wicket

हर जगह सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट का प्रचार किया जाता है। क्रिकेट में भारत की स्थिति मजबूत होने का एक कारण इस खेल में कम उपकरण की जरूरत होना भी है बच्चे बचपन से हीं एक बल्ला और एक गेंद लेकर गली-मोहल्ले में कहीं भी शुरू हो जाते हैं लेकिन यदि कोई तैराकी, टेनिस, बैडमिंटन में कॅरियर बनाना चाहता है तो कोई प्रोत्साहन हीं नहीं मिलता।


खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना

भारत में खेलों की स्थिति व स्तर में सुधार के लिए भारत सरकार द्वारा लाया गया खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना बहुत हीं प्रसंशनीय है। हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, किन्तु खिलाड़ियों को उचित व्यवस्था और बेहतर तकनीक के अभाव में अच्छा प्रदर्शन करना काफी चुनौतियों भरा होता है। देश में खेलों को बढावा देने और नई प्रतिभाओं को तलाशने के उद्देश्य से भारत सरकार के खेल मंत्री श्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा राजीव गांधी खेल योजना, शहरी खेल संरचना योजना, ग्रामीण खेल योजना और राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज योजना को मिलाकर इनके स्थान पर ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम योजना पेश किया गया है।

इस खेल कार्यक्रम योजना के तहत सरकार ने 10 साल की उम्र से ही प्रतिभावान खिलाड़ी बच्चों का पोषण करने का फैसला किया है। सरकार हर साल 1000 बच्चों को चयन करेगी और उन्हें अगले 8 साल तक 5 लाख रुपए सालाना छात्रवृत्ति देगी ताकि वह अपने खर्चे उठा सकें और केवल खेलों पर ही ध्यान दे सकें।
Khelo india, sports minister, kiren rijiju
खेलो इंडिया के एक कार्यक्रम में खेल मंत्री किरण रिजिजू

इस कार्यक्रम का लक्ष्य देश में 20 विश्वविद्यालयों को खेल की उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में बढ़ावा देना है ताकि प्रतिभाशाली खिलाड़ी अपनी शिक्षा के साथ समझौता किए बिना प्रतियोगी खेलों में आगे बढ़ने में सक्षम हो पाए। इस योजना में आवेदन करने के लिए उम्र 8 वर्ष से 12 वर्ष के बीच होनी चाहिए। खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना की रूपरेखा से लगता है यदि सरकार योजना को सही से क्रियान्वित करने में सफल रहती है तो आगामी वर्षों में यह योजना भारत में खेल के विकास में एक क्रांति साबित होगी।
     बहरहाल देश मे खेलों की वर्तमान स्थिति जो भी हो उम्मीद है टोक्यो ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी अपने अच्छे प्रदर्शन से अधिक से अधिक संख्या में पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करेंगे...




इसे भी पढें...

0 comments: