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Saturday, 4 January 2020

दलितों का धर्म-परिवर्तन और सिमटता हिन्दू धर्म


दलितों का धर्म-परिवर्तन और सिमटता हिन्दू धर्म

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जातिवाद और  छुवाछुत  के  नाम पर  दलितों  का दशकों  से  धर्म-परिवर्तन जारी है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दलित वोटों की राजनीति ने इसमें उत्प्रेरक का काम किया है। दशकों से  हो  रहे  दलितों  के  धर्म-पलायन  के  कारण  कुछ  क्षेत्रों  में  हिन्दू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं।
       हिन्दू धर्म को दुनियां का सबसे प्राचीन धर्म है, कहते हैं एक समय था जब पूरे विश्व में हिन्दू धर्म फैला हुवा था फिर ईसा पूर्व 6ठी शताब्दी में जैन, बौद्ध, 16वीं ई में सिख हमसे अलग हो गए और अब 20 वीं और 21वीं सदी में दलित हमसे अलग हो रहे है। दलितों को लगने लगा है कि हिंदू धर्म से बाहर निकलना उनके लिए बेहतर रास्ता हो सकता है आखिर इस सब सबका जिम्मेदार कौन है?
           हिन्दू समाज को श्रम विभाजन के आधार पर चार वर्णों में विभक्त किया गया था। किन्तु कालान्तर में इससे हजारों जातियाँ बन गयीं। श्रम विभाजन के आधार पर विभक्त समाज धीरे-धीरे जन्म के आधार पर विभक्त होती गई, जिससे धीरे-धीरे समाज मे उच्च नीच की भावना पनपने लगी, लोग जातिगत भेदभाव के शिकार होने लगे, छुवाछुत की भावना समाज मे जहर के जैसे घुल गई और फिर शुरू हुआ धीरे-धीरे वंचितों, कमजोरों और दलितों का शोषण।  

डॉ अम्बेडकर की दीक्षा और दलितों के धर्म-परिवर्तन की शुरुआत

         डॉ अम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की। 
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बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर

   बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जीवन भर छुवाछुत, जातिगत भेदभाव से पीड़ित रहे और जीवनपर्यंत इन सामाजिक कुरीतियों से लड़ते रहे, अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म  स्वीकार कर लिया। नागपुर के दीक्षा भूमि में जब 14 अक्टूबर 1956 को वे बौद्ध धर्म का दीक्षा ले रहे थे तो बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले वो अकेले नही थे उनके साथ लगभग तीन लाख दलित भी थे जो बाबा साहेब के विचारों से प्रेरित होकर और अपने ऊपर हो रहे जुल्मों से तंग आकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ले रहे थे। अगले दो-तीन दिनों में बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर 8 लाख से अधिक लोगों ने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन दिनों को इतिहास सिर्फ इसलिए याद नही रखेगा की लाखों लोग बौद्ध बने थे बल्कि इसलिए भी याद रखेगा की लाखों हिन्दुओ ने हिन्दू धर्म का त्याग किया था। एक बौद्ध के रूप में बाबा साहब मात्र एक महीना और 22 दिन ही जी सके लेकिन इस अल्प समय में वे जहाँ भी गए दलितों को हिन्दू धर्म त्यागने के लिए प्रेरित करते रहे परिणामस्वरूप आज भारत के कुल धर्मपरावर्तित बौद्धों की संख्या लगभग 73 लाख हैं, उनमें से लगभग 90% महाराष्ट्र में हैं। उस समय से जो दलितों का हिन्दू धर्म त्यागने का सिलसिला चला है दलितों के वोट बैंक की राजनीति करने वाले नेताओं के कारण बढ़ता चला जा रहा है। 

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दीक्षा भूमि, नागपुर

दिन प्रतिदिन दलित हिन्दू धर्म से दूर होते जा रहे है, फेसबुक के कुछ दलित समूहों या फिर यूट्यूब के कुछ दलित समर्थित चैनलों के पोस्ट और वीडियो को आप देखेंगे तो आपको आश्चर्य होगा दिन-प्रतिदिन इनलोगो के मन मे हिन्दू धर्म के प्रति कितनी नफरत भरते जा रही है।
              मानव सभ्यता 21वीं शताब्दी में पहुँच गई है, आज मानव मंगल ग्रह पर बसने के सपने देख रहे हैं। आज विश्व में भारत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आया है।भारत में पिछले 4-5 दशकों में साक्षरता दर में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है फिर भी समाज में जातिवाद और छुवाछुत की भावना खत्म नहीं हो पा रही है। वसुधैव-कुटुम्बकम का संदेश देने वाले हिन्दू धर्म में कुछ मानसिक रूप से बीमार हिंदुओ के कारण आये दिन देश में दलितों के प्रति अत्याचार की खबरें सुनने को मिलती रहती है।

दलितों पर अत्याचार कब रुकेंगे?

            आखिर क्यों गुजरात के उना में दलित युवकों को बेरहमी से पीटे जाते हैं और लंबी मूंछें रखने नाम में ‘सिंह’ लगाने या घुड़सवारी करने पर कुछ तथाकथित उच्च जातियों के ठेकेदारों को तकलीफ होने लगता है। क्यों कहीं दलित सरपंच को स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर तिरंगा न फहराने दिया जाता है, क्यों कहीं मिडडे मील के वक्त दलित छात्रों को अलग बैठाये जाते हैं। दलित युवक के शादी में घोड़ी चढ़ने पर क्यों किसी को आपत्ति होता है। दलित युवक संजय जाटव आखिर कसूर क्या था जो उनको शादी में घोड़ी चढ़ने के लिए पुलिस-कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। 
            सवाल बहुत हैं लेकिन सोचने वाली बात ये है क्या कभी इन नफरतों का अंत हो पायेगा? हज़ारों वर्षों से दलित वर्ग पर अत्याचार होते आए हैं आज भी हो रहे हैं, ये अत्याचार एक समाज पर दूसरे तथाकथित उच्च समाज द्वारा हो रहे अन्याय और अत्याचार का प्रश्न है। इस अत्याचार के कारण प्रति वर्ष हजारों दलित हिन्दू धर्म छोड़कर दूसरे धर्म को अपना रहे हैं। कभी पूरी दुनियां में फैला हिन्दू धर्म, आज अपने मूल देश में ही सिमटता जा रहा है। परम्परागत उच्च वर्ग द्वारा दलितों पर बेक़सूरी एवं बेरहमी से किए जा रहे अत्याचार और दलितों का धर्म-परिवर्तन कैसे रोका जाए, वर्तमान में तो यही हिन्दू धर्म की मूल समस्या है।

वसुधैव-कुटुम्बकम हीं हिंदुत्व की मूल भावना


            पिछले कुछ दशकों में दलितों के धर्म-पलायन के कारण हिंदुओ की आबादी पर काफी प्रभाव पड़ा है। कई क्षेत्रों में हिन्दू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं, उन क्षेत्रों में कुछ धर्म विशेष लोगों की बहुलता के कारण आये दिन बचे-खुचे हिंदुओ को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।  अभी समय है जातिवाद और छुवाछुत की भावना को भुलाकर एकजुट होने का। हिन्दू धर्म की मूल भावना वसुधैव-कुटुम्बकम को आत्मसात कर हिंदुत्व की विचारधारा को विस्तार करने का। अपने अंदर दूसरों के प्रति प्यार और सद्भाव समाहित करने का जिससे जो हिन्दू धर्म त्याग कर दूसरे धर्म अपना चुके है वो घर वापसी को प्रोत्साहित हो। ये तभी संभव हो सकेगा जब हिन्दू धर्म के सभी संगठन एकजुट होकर आगे आएंगे और लोगों को उन हिन्दू-धर्मद्रोहीयों को चिन्हित कर सजा दिलाने को प्रोत्साहित करेंगे जिनके नफरतों से तंग आकर कुछ हिन्दू धर्म-परिवर्तन कर लेते हैं।
         पहले जैन, बौद्ध, सिख अलग हुवे, अब दलित अलग हो रहे हैं, नफरतों का सिलसिला नहीं थमा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दू अपने देश में हीं अल्पसंख्यक बनकर रह जायेंगे। हमें एकजुट होकर इस नफरत के खिलाफ जंग लड़नी होगी ताकि बचा रहे हिन्दू धर्म।



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