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Tuesday, 25 February 2020

झूठे दावों और लुभावने वादों की राजनीति...

जनता के मजबूरियों का ये कैसा इस्तेमाल...?
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फ़ोटो: सोशल मीडिया

     कुछ साल पहले प्रकाश झा साहब की एक फ़िल्म आई थी, 'राजनीति'। यदि आपने ये फ़िल्म देखी होगी तो आपको याद होगा उसमें भास्कर सान्याल (नसीरुद्दीन शाह का किरदार) एक रैली में मजदूरों और किसानों के भीड़ को इंगित करते हुए अपने साथी नेता से कहते है "ये भूखों और नंगो की भीड़ है साहब इन्हें दो वक्त की रोटी का लालसा दे दीजिए किसी भी पार्टी का झण्डा उठाने के लिए तैयार हो जाएंगे ये, इन्हें नही मतलब देश से इन्हें नही मतलब राजनीति से इन्हें मतलब है तो बस दो वक्त की रोटी से..."
     भारतीय राजनीति का यही सच है, दशकों से राजनीतिक पार्टियां किसानों-मजदूरों को दो वक्त की रोटी का लालसा देकर सरकार बनाते आई है, लेकिन जनता जानती है सत्ता में आने के बाद उन्हें न मजदूरों के मज़दूरी की फिक्र हुई है और न हीं किसानों के अनाज के उचित दाम की। ये पार्टियां चुनाव से पहले ढेर सारे वादों से जनता को बरगला कर सत्ता में तो आ जाती है लेकिन उसके बाद किसानों, मजदूरों और गरीबों के प्रति किये वादे को एक-एक कर कुचलकर जनता के भरोसे की हत्या करती है। चुनाव लड़ते वक्त दबंग से दबंग नेता भी भीगी बिल्ली बने रहते हैं। वे खुद को जनता का सेवक, दास, नौकर, भक्त; क्या-क्या नहीं बताते। वोट मांगने के लिए जनता के चरणों में गिर पड़ते हैं, ऐसे-ऐसे स्वांग रचते हैं कि पेशेवर भिखारी भी उनके आगे पानी भरने लगें और चुनाव के बाद वही नेता मालिक बने फिरते हैं।

सत्ता की राजनीति और सियासत का खेल

      दशकों से भारतीय राजनीति में ऐसा होते आया है, पिछले साल छतीसगढ़ में चुनाव पूर्व दस दिनों में कर्ज माफी का वादा किया गया था। कुछ कांग्रेसी नेताओं द्वारा जनता को कर्जमाफी का यकीन दिलाने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में हाथ में गंगा जल लेकर कसम भी खाया गया था। चुनाव परिणाम आने के बाद बहुमत से कांग्रेस की सरकार बनी और कर्ज माफी हुवा तो कुछ किसानों का जरूर लेकिन जब कुछ मीडिया समूहों द्वारा इसकी पड़ताल किया गया तो सच सामने आया किसी का 450 रुपये तो किसी का 600 रुपये का कर्ज माफ हुवा। चुनाव पूर्व सरकार के दावों को याद करके जहाँ किसानों मजदूरों में खुशी की लहर थी की जानलेवा कर्ज से मुक्ति मिलेगी, वही अपने कर्जमाफी की राशि को देख कर किसान-मजदूर ठगा महसूस करते रहे। छत्तीसगढ़ में हीं चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा किसानों को धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपये प्रति क्विंटल देने का घोषणा किया गया लेकिन जब सत्ता में आई तो पुराना दर 1815 रुपये से 1835 रुपये प्रति क्विंटल तक में हीं किसानों को धान बेचने को मजबूर होना पड़ा। वही राजस्थान में गहलोत सरकार कर्ज माफी में तो एक कदम आगे निकल गई, जिन किसानों ने कोई भी बैंक से कर्ज नही लिया है कर्ज माफी सूची में वैसे भी किसानों के नाम शामिल कर दिया गया। डुंगरपुर जिला के किसानों ने ये आरोप लगाया है कि जब ऋण लिया ही नहीं तो 120 करोड़ की कर्ज माफी कैसे? भारी हंगामे के बाद सूची को सम्पादित कर वैसे लोगों के नाम को निकाला गया। मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस द्वारा बेरोजगार युवाओं को लुभाने के लिए एक निश्चित बेरोजगारी भत्ते का घोषणा किया गया था लेकिन सत्ता में आये डेढ़ साल होने को हैं न बेरोजगारी भत्ते का पता है और न हीं सरकार को बेरोजगारों की कोई फिक्र है।
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PHOTO : Social Media (PC : Sushil)

'वादाखिलाफी' राजनीति की प्रचलित शैली

   ऐसा नहीं है की ये वादाखिलाफी केवल कांग्रेस में है, भारतीय जनता पार्टी 2014 लोकसभा चुनाव से पहले अपने घोषणा पत्र में सत्ता में आने पर प्रति वर्ष 1 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का वादा किया था, भाजपा को सत्ता में आये 6 वर्ष होने को हैं प्रति वर्ष एक करोड़ रोजगार तो सपनें की बात हो गई है, इसके विपरीत बेरोजगारी का ये आलम है की बेरोजगारी दर 45 साल में सबसे उच्चतम स्तर पर है। ऐसे दर्जनों वादे हैं जो भाजपा द्वारा चुनाव से पहले जनता का विश्वास जितने के लिए किया गया और फिर सत्ता में आने के बाद बार-बार जनता के उम्मीदों को तोड़ा गया।
       राजनेताओं का ये वादाखिलाफी कोई नया नहीं है जब आप भारतीय राजनीति का अतीत देखेंगे तो पाएंगे ये राजनीति का एक शैली बन गया है जनता को बरगला कर बड़े-बड़े वादों की झड़ी लगाकर किसी तरह उनका विश्वास जीतकर सत्ता में आना और फिर किए गए वादों और जनता के भरोसे को कुचल डालना।
       लेकिन हाँ, पार्टियां भले हीं जनता को भूल जाए अपनों को कभी नहीं भूलती है। आइये इनसे मिलिए, आप झोला छाप डॉक्टर से मिले होंगे, झोला छाप नेता से मिले होंगे ...मिलिए डेप्युटी कलेक्टर से..
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आशिष कर्मा (फ़ोटो : सोशल मीडिया)
          ये है आशीष कर्मा, स्वर्गीय श्री महेंद्र कर्मा (झीरम घाटी नक्सली हमला में जान गँवाने वाले कॉंग्रेसी नेता) के तीसरे बेटे। अब डिप्टी कलेक्टर बनने के लिये लोक सेवा आयोग की परीक्षा देना, क्वालिफाई करना जरूरी नही, कांग्रेसी नेता का बेटा होना ही काफी है।
    हाल ही में छत्तीसगढ़ सरकार ने आशीष कर्मा को अनुकम्पा नियुक्ति के आधार पर राज्य सेवा का सबसे बड़ा प्रशासनिक पद दिया! जिनके माता पिता विधायक रह चुके है, बड़े भाई जिला पंचायत में प्रतिनिधि है और अनुकम्पा मिला! अगर उन्हें कहीं समायोजित करना ही था तो किसी निगम मंडल में अध्यक्ष बना देते या अपने साथ राजनीति में ही शामिल कर लेते। इनकी नियुक्ति उन लाखों विद्यार्थियों के साथ मजाक है, उनके भरोसे का हत्या है जो एक अदना सा नौकरी के इंतजार में कब 50 साल का हो जाता है उसे पता नहीं चलता। जनता जानना चाहती है भूपेश बघेल साहब क्या ऐसे गढ़ेंगे नवा छत्तीसगढ़!! भ्रष्टतम तरीके से जनता के उम्मीदों और विश्वासों का गला घोंटते हुए उन्हें डिप्टी कलेक्टर तो बना दिया, इस पर आपत्ति नहीं पर लम्बित अनुकम्पा के सैकड़ों मामलों पर भी तनिक विचार कर लेते। अनुकंपा के आधार पर सीधा डिप्टी कलेक्टर बनाए जाने पर कई लोगों ने नाराजगी जताई, खुद कलेक्टर रह चुके और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में खरसिया विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार ओपी चौधरी ने इस नियुक्ति को लाखों युवाओं के साथ अन्याय बताया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कांग्रेस सरकार से सवाल करते हुए लिखा : मैं महेन्द्र कर्मा का बहुत सम्मान करता हूं, कर्मा के बाद उनके परिवार से विधायक रहे, नगर पंचायत अध्यक्ष हैं, जिला पंचायत में भी प्रतिनिधित्व है, लोकसभा में भी उनके परिवार से चुनाव लड़ा गया। यह सब अपनी जगह है, लेकिन अब उनके एक पुत्र को कांग्रेस सरकार ने सीधा डिप्टी कलेक्टर बना दिया। यदि कर्मा होते तो शायद वो अपने बेटे को काबिलियत के आधार पर कलेक्टर या डिप्टी कलेक्टर बनाना पसंद करते न कि तुष्टिकरण की राजनीति के तहत।

जनतंत्र पर हावी होता नेतातंत्र

        लोकतंत्र में जनता प्रतिनिधि होता है। हमारे महापुरुषों ने देश में लोकतंत्र की स्थापना जनता के हित को ध्यान में रखते हुवे किया था लेकिन कुछ नेता समय-समय पर इस लोकतंत्र का दुरुपयोग कर जनता के हितों की अनदेखी कर अपने फायदे के लिए सोचते रहा है। देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक हो गए है इन सत्तर सालों में देश में जितना तरक्की नेताओं का हुवा है शायद हीं कभी जनता का हुवा हो। जनता के हित के लिए स्थापित लोकतंत्र को नेताओं ने क्या जादू बना दिया है जो भी कोई राजनीति में शामिल होता है चंद सालों में हीं मालामाल हो जाता है।
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(फ़ोटो : सोशल मीडिया)
कितनी विडम्बना है एक कर्मचारी 35-40 सालों तक देश के लिए काम करे तो उसे पेंशन मिलने की गारंटी नहीं है लेकिन एक नेता एक दिन के लिए भी विधायक या सांसद बनता है तो उसे पूरी जिंदगी पेंशन मिलता है। और तो और यदि एक नेता अपने जीवन में विधायक, सांसद और विधान परिषद का सदस्य तीनों रहा हो तो उसे एक साथ तीन पेंशन मिलता है। ये ऐसा लोकतंत्र है जहाँ नेता सरकार में आकर उधोगपतियों के हित में कानून बनाता है और फिर वही उधोगपति देश के पैसे को डकार कर खुद को दिवालिया घोषित करा लेता है या फिर देश छोड़कर भाग जाता है और सरकार हाथ पर हाथ धरे रह जाती है। आखिर क्यों कोई देश का हजारों करोड़ लूट कर चैन की नींद सोता है और एक किसान 5 हजार के कर्ज न चुका पाने के डर से आत्महत्या कर बैठता है। आखिर जनता के हित के लिए स्थापित इस लोकतंत्र में क्या कभी जनता का भी हित होगा।
        दशकों से जनहित के नाम पर सब्सिडी दिया जाता रहा है आजकल कहीं मुफ्त का भी प्रचलन बढ़ रहा है, सब्सिडी और मुफ्त बाँटने के नाम पर प्रत्येक साल हज़ारों करोड़ खर्च कर दिए जाते हैं लेकिन सच्चाई यह है की जनता को सब्सिडी की नहीं एक नौकरी की जरूरत है। जनता को सक्षम बनाने की जरूरत है मुफ्तखोर नहीं। जनता एक बार जब सक्षम बन जाएगी उसे न हीं सब्सिडी की जरूरत पड़ेगी और न हीं मुफ्तखोरी की।
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(फ़ोटो : सोशल मीडिया)

नेताओं के संदर्भ में किसी ने सच हीं कहा है...

      वो सौदागर डॉलर का हैं वो खेती को क्या आँकेगा,
         धरती रोटी ना देगी तो खाने में सोना फाँकेगा ?







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