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Wednesday, 29 January 2020

जनसंख्या नियंत्रण कानून (Population Control Law) क्यों जरूरी...?


जनसंख्या नियंत्रण कानून (Population Control Law)क्यों जरूरी...?


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जनसंख्या नियंत्रण कानून : भारत की तेजी से बढ़ती जनसंख्या पर प्रभावी नियंत्रण के लिए जनसंख्या नियंत्रण कानून आवश्यक हो गया है। जनसंख्या नियंत्रण कानून जरूरी है ताकि जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन बना रहे। समय रहते जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपाय नहीं किये गए तो आने वाले दशकों में देश को इसके भयानक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

      पूरी दुनियां वर्तमान में जिन तीन प्रमुख समस्याओं का सामना कर रही है वो हैं आतंकवाद, प्रदूषण और जनसंख्या विस्फोट। दुर्भाग्य से भारत इन सभी समस्याओं से बुरी तरह पीड़ित है।

भारत की जनसंख्या वृद्धि


     भारत की आबादी 1901 में  23 करोड़ थी, 1950 में बढ़कर 37 करोड़ हो गई, 2000 में 100 करोड़ और अभी 2020 के शुरुआत में अनुमानतः 135 करोड़ पार कर चुकी है। अनुमान है 2061 में 168 करोड़ हो जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ की 'द वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स 2019' रिपोर्ट के मुताबिक 2027 तक भारत चीन को पीछे छोड़ते हुवे दुनियां में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। ऐसे में देश में ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो रही है आज पाकिस्तान और चीन जैसे देशों से खतरा कम और जनसंख्या विस्फोट का खतरा ज्यादा बढ़ रहा है। भारत के पास पूरी दुनियां के 2.4 प्रतिशत भूमि है, लेकिन जनसंख्या पूरी दुनियां के 18 प्रतिशत है। 
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जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम 


        अनियंत्रित जनसंख्या वृ​द्धि के कारण आज स्वतंत्रता प्राप्ति के 7 दशक बाद भी भारत की 40 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है। आर्थिक वृद्धि एवं देश के विकास का पूरा लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा। निरक्षरता एवं कुपोषण की समस्या से छुटकारा नहीं मिल रहा। भुखमरी, निर्धनता, बेकारी, भिक्षावृत्ति तथा अन्य सामाजिक व आर्थिक बुराईयों से छुटकारा तभी मिल सकेगा जब हम अपनी जनसंख्या पर नियंत्रण रखेंगे, अन्यथा हम विकास एवं प्रगति से होने वाले लाभों से वंचित रह जायेंगे। हमारा देश कई समस्याओं से जूझ रहा है। अगर गौर करें तो पायेंगे कि जनसंख्या में वृद्धि इन सभी समस्याओं का मूल कारण है। बेरोजगारी हो या भ्रष्टाचार, अराजकता हो या आतंकवाद, निरक्षरता हो या फिर अन्य सामाजिक समस्यायें जनसंख्या कम होने पर यह स्वतः हल हो सकती हैं।
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लम्बी ट्रैफिक जाम का एक दृश्य

        जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम है कि पिछले 4-5 दशकों में बेरोजगारी और कुपोषित लोगों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हुई है। बढ़ती बेरोजगारी का आलम ये है की पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में 200 चपरासी पद के लिए आवेदन आमंत्रित किये गए थे जिसके लिए 50 लाख से अधिक लोगों ने आवेदन दिया था। जनसंख्या वृद्धि का असर शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन आदि सुविधाओं पर सीधे-सीधे पड़ रहा है। स्कूलों में छात्रों को दाखिला नहीं मिलता, अस्पतालों में मरीजों की ठीक से देखभाल नहीं हो पाती और बसों, रेलगाडियों में भीड़भाड़ बढ़ती जा रही है। शहरों, महानगरों में सड़कों पर गाड़ियों की लम्बी-लम्बी कतारों के कारण दिन-रात जाम की स्थिति बनी रहती है।
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रेलवे स्टेशन में छात्रों की भारी भीड़(PC : TWITTER) 

पुरूष नसबंदी अभियान        


आजादी के बाद जनसंख्या विस्फोट से निपटना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती थी। जनसंख्या नियंत्रण के लिए लोगों को परिवार नियोजन के प्रति जागरूक करने के लिए  सरकार द्वारा बहुत उपाय किये गए लेकिन परिणाम संतोषजनक नहीं रहा फिर आपातकाल के समय कांग्रेस सरकार द्वारा पुरूष नसबंदी अभियान चलाया गया। जिसमें सभी सरकारी अधिकारियों को साफ निर्देश था कि नसंबदी के लिए तय लक्ष्य को वह समय पर पूरा करें, नहीं तो तनख्वाह रोककर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। परिणामस्वरूप इस दौरान घरों में घुसकर, बसों से उतारकर और लोभ-लालच देकर लोगों की नसबंदी की गई। एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ एक साल के भीतर देशभर में 62 लाख से ज्यादा लोगों की नसबंदी कर दी गई। इनमें 15-16 साल के किशोर से लेकर 70 साल के बुजुर्ग तक शामिल थे। यही नहीं गलत ऑपरेशन और इलाज में लापरवाही के कारण करीब दो हजार लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ी। फिर आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस सरकार गिर गई और लोगों को इस जबरन नसबंदी अभियान से राहत मिला। सरकार गिरने के पीछे नसबंदी के फैसले को भी एक बड़ी वजह माना गया। उसके बाद 'हम दो हमारे दो' और 'छोटा परिवार सुखी परिवार' जैसे परिवार नियोजन सम्बंधी सरकारी नारे बहुत लगाए   गए मुफ्त में गर्भ निरोधक दवाएं और कंडोम बाटे गए किन्तु जनसंख्या नियंत्रण दर में कमी लाने के लिए कभी कोई ठोस पहल नहीं की गई। देश में राष्ट्रीय स्तर पर परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए आंध्र प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में परिवार नियोजन के क़ानून लागू है लेकिन कानून में कड़े प्रावधानों के कमी के कारण यह प्रभावहीन है। 5 दशक पहले चीन में हो रही अन्धाधुन्ध जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पाने के लिए 1979 में चीन में एक बच्चे की नीति लागू की गई थी। लेकिन भारत में कड़े कानून के अभाव में देश की अनियंत्रित जनसंख्या देश के विकास में बाधा बनता रहा है।

बढ़ती आबादी एक राजनीतिक विफलता


वास्तव में देश की अनियंत्रित बढ़ती आबादी राजनीतिक विफलता का ही परिणाम है। जनसंख्या नियंत्रण का सपना ठोस कानून व्यवस्था के बिना पूरा नहीं किया जा सकता है। देश में एक ऐसे कानून की जरूरत है जिससे लोग परिवार नियोजन के लिए बाध्य हों जाय। मौजूदा एनडीए सरकार से देशवासियों को जनसंख्या नियंत्रण कानून के रूप में एक ऐसे कानून की उम्मीद है जो देश की जनसंख्या नियंत्रण के लिए निर्णायक साबित हो। लेकिन ओवैसी जैसे कुछ तथाकथित धर्म के ठेकेदार नेताओं के जनसंख्या नियंत्रण कानून के खिलाफ लगातार बयानबाजी और विरोध से लगता है सरकार के लिए इसे कानून का रूप देना आसान नहीं होगा। ओवैसी जैसे नेता जनसंख्या विस्फोट के दुष्परिणाम के बारे में सोचे बिना अपने कौम को अंधेरे में रख जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुददों का अपने राजनीतिक फायदे के लिए हमेशा से विरोध करते रहे हैं ताकि दिन-प्रतिदिन मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ती रहे और उनका वोट बैंक का फसल लहलहाते रहे। बात हिन्दुओं की कि जाए तो बिना कानून पास हुए भी परिवार नियोजन के मामले में जहां करीब 90 फीसदी हिन्दू एक या दो बच्चों के सिद्धांत पर चल रहे हैं, वहीं मुसलमान अपने धर्म संबंधित धार्मिक मान्यताओं के कारण परिवार नियोजन को धर्म के विरुद्ध मानते हैं। आलम यह है की जिनके घर में खाने के दो वक्त का अनाज नहीं है वो भी अपने वर्तमान और भविष्य का फिक्र किये बगैर बच्चे-दर-बच्चे पैदा किये जा रहे हैं उन्हें न अपने बच्चे के स्वास्थ्य से मतलब है और न ही उनके शिक्षित होने से। जिसके कारण कम हीं उम्र से उनके बच्चों को माता-पिता का सहयोग मिलना बन्द हो जाता है और फिर वही बच्चे शिक्षा, रोजगार और सहयोग के अभाव में लाचारी और बेगारी में कहीं पंचर बनाते, मजदुरी करते तो कभी गलत संगत में पड़ कर चोरी-डकैती करते देखे जाते हैं। ओवैसी जैसे नेता अपने राजनीतिक फायदे के लिए दशकों से मुसलमानों का इस्तेमाल करते आये हैं। वे उन्हें शिक्षा, रोजगार और बेहतर जीवनयापन के लिए प्रेरित करने के बजाय घटिया धार्मिक मान्यताओं में उलझाये रखते हैं ताकि ये अशिक्षित रहे और उनके वोट बैंक बने रहे।

जनसंख्या नियंत्रण कानून पर राज्यसभा में निजी विधेयक पेश।

     जनसंख्या नियंत्रण को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  का नजरिया हमेशा से हीं स्पष्ट रहा है। आरएसएस जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर दशकों से आवाज उठाता रहा है। कई मौकों पर आरएसएस प्रमुख कह चुके हैं की यदि सरकार जनसंख्या नियंत्रण के लिए दो बच्चों की नीति जैसे कोई कानून बनाती है तो संघ उस कानून का समर्थन करेगा। संघ के विचारक और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा द्वारा 12 जुलाई 2019 को राज्यसभा में प्रति दंपति दो बच्चों के मानकों से संबंधित एक निजी विधेयक पेश किया गया। इस विधेयक में एक परिवार में सिर्फ़ दो बच्चों के होने का ज़िक्र किया गया। इस विधेयक का नाम जनसंख्या विनियमन विधेयक 2019 रखा गया था।

इस विधेयक के कुछ प्रावधान...


दो बच्चे की नीति न मानने वालों को...
लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित किया जाए

नौकरियों में प्राथमिकता ना मिले

लोन लेने पर अधिक ब्याज़ लगे

जमा रकम में कम ब्याज़ मिले

दो बच्चे की नीति मानने वाले को...

बैंक डिपॉज़िट में ज़्यादा ब्याज़ मिले

बच्चों को शिक्षा में प्राथमिकता मिले
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प्रो. राकेश सिन्हा एक कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए(PC: TWITTER)

अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि विकास में बाधक


      विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए जनसंख्या पर नियन्त्रण करना अतिआवश्यक बन पड़ा है। हमारी आबादी में अभी भी हर दिन पचास हजार की वृद्धि हो रही है। इतनी बड़ी जनसंख्या को भोजन मुहैया कराने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा खाद्यान्न उत्पादन प्रतिवर्ष उस अनुपात में बढ़े, वर्तमान में ये सम्भव नहीं है जिसके कारण दूसरे देशों के प्रति हमारी खाद्यान्न निर्भरता बढ़ती रही है जो देश के विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है। अनियंत्रित जनसंख्या देश में अर्थव्यवस्था, सामाजिक समरसता और संसाधन का संतुलन बिगाड़ रहा है। जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन बना रहे इसके लिए देश में जनसंख्या नियंत्रण अति आवश्यक बन पड़ा है एक आंकड़े बताते हैं पिछले सात दशकों में भारत की जनसंख्या में 366 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वहीं इस अवधि में अमेरिका की जनसंख्या में सिर्फ 113 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।

        2019 में दूसरी बार एनडीए सरकार बनने के बाद लगातार केंद्र सरकार द्वारा तीन तलाक पर प्रतिबंध, कश्मीर से धारा 370 का खात्मा और नागरिकता संशोधन कानून जैसे कई निर्णायक कदम उठाये जा चुके हैं अब भारतीय जनता को उम्मीद है सरकार जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में ठोस पहल करते हुवे इसके लिए कोई प्रभावी कानून बनाएंगी।








Wednesday, 25 December 2019

एक देश - एक भाषा के सपनें और उपेक्षित हिंदी


एक देश - एक भाषा के सपनें और भाषायी विवाद


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एक देश - एक भाषा की सपना साकार हो ये जरूरी है वर्षों से उपेक्षित हिंदी के उचित सम्मान के लिए, सशक्त भारत के निर्माण के लिए। एक देश - एक भाषा जरूरी है दुनियां में अपनी भाषा तथा संस्कृति की विशिष्ट पहचान के लिए। देश में सर्वाधिक बोली जाने वाली जन-जन की भाषा हिंदी हीं हमारी एक देश - एक भाषा के सपनें को साकार कर सकती है।

       भाषा व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के गौरव और सम्मान का प्रतीक होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार दुनियां में 6809 भाषाएँ बोली जाती है उनमें से हिंदी दुनियां में तीसरी तथा भारत में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। विश्व की लगभग 11% आबादी हिंदी में संवाद करती है। हिंदी विश्व के सभी महाद्वीपों तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त होती है। हिंदी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही साथ हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है।
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हिंदी दिवस का इतिहास

     14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया और लागू किया गया तो गैर-हिंदी भाषी राज्य के लोग इसका विरोध करने लगे, हिंदी के विरोध में कई आंदोलन हुवे और अंग्रेजी को भी राजभाषा का दर्जा देना पड़ा। धीरे-धीरे देश में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव बढ़ने लगा और हिंदी उपेक्षित होती चली गयी। लंबे समय तक देश मे शाषण करने वाले कांग्रेस सरकारों ने हिन्दी की उपेक्षा की है, जबकि आजादी से पहले जितने भी आंदोलन हुए, उनसे हिंदी भाषा को मातृभाषा के रूप में सम्मान और खासा प्रोत्साहन मिला था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। फिर भी आजादी के  सात दशकों के बाद राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित राजभाषा हिंदी अपने अस्तित्व-संघर्ष में प्रयत्नरत है। 
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          प्रत्येक विकसित तथा स्वाभिमानी देश की अपनी एक भाषा अवश्य होती है जिसे राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त होता है। शायद भारत इकलौता ऐसा देश है, जिसकी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। बल्कि यूं कहें कि आजादी के 72 सालों बाद भी भारतवर्ष की कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है। कोई राष्ट्रभाषा होंगी, देश के कोने-कोने में यदि एक भाषा का प्रवाह होगा, तो ना केवल यह देश की एकता और अखंडता को मजबूती प्रदान करेगा बल्कि जनता को भी एक कड़ी में जोड़ने में अहम रोल निभायेगा।
          

   राजभाषा हिंदी बनाम राष्ट्रभाषा हिंदी की समस्या

         हिंदी आजादी के बाद से ही दक्षिण भारतीय नेताओं तथा कुछ स्थानीय ग़ैर-हिन्दी भाषी नेताओं के राजनीति का शिकार होती रही है ये नेता अपने क्षणिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए दशकों से हिंदी का विरोध करते आये हैं, कितनी विडम्बना है इन्हें विदेशी भाषा अंग्रेजी स्वीकार है लेकिन इन्हें अपने देश में सर्वाधिक बोली जानी वाली भाषा हिंदी स्वीकार नही है। गांधी जी ने हिंदी को जनमानस की भाषा बताया था। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1918 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को देश का राष्ट्रभाषा बनाने के लिए पहल की थी। उनका सपना था हिंदी हमारे देश की राष्ट्रभाषा बनें लेकिन जाति-भाषा के नाम पर राजनीति करने वालों और सत्ता-लोलुप नेताओं ने कभी हिंदी को राष्ट्रभाषा नहीं बनने दिया।
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हिंदी के प्रति सरकार की उदासीनता

      आजादी के बाद से ही हिंदी के प्रचार-प्रसार में सरकारों की उदासीनता तथा सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी के अत्यधिक इस्तेमाल के कारण हिंदी अपने हीं देश में उपेक्षित रही है।
    भारतीय संविधान के भाग 17 अनुच्छेद 351 में हिंदी भाषा के विकास के लिए दिया गया विशेष निर्देश :- "संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके..."
         परंतु पिछली यूपीए सरकार ने इसके विपरीत 2011 में अंग्रेजी को बढ़ावा देते हुवे यूपीएससी परीक्षा के प्रथम चरण में बिना सोचे समझे अंग्रेजी अनिवार्य कर दी परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं के जो अभ्यर्थी 20 से 25% इन सेवाओं में चुने जाते थे वह घटकर 3% से भी कम रह गए। भारी विरोध के बाद एनडीए सरकार द्वारा 2014 में प्रारंभिक चरण सीसैट से अंग्रेजी हटाई गई।
         

हिंदी की उपेक्षा

        वर्तमान में हमारे देश के 75% से अधिक केंद्रीय तथा राज्यस्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में अंग्रेजी अनिवार्य है जबकि इन प्रतियोगी परीक्षाओं से नौकरी प्राप्त किये हुवे लोगों को जिन भारतीयों के बीच, जिन भारतीयों के लिए काम करना पड़ता है उनमें से 95% हिंदी भाषी या फिर स्थानीय भाषाई होते है, फिर भी पता नही क्यों सरकारें लोगों पर अंग्रेजी भाषा को जबर्दस्ती थोपने की कोशिश करती रही है और इसमें वो कामयाब भी हुई है इन्ही कारणों से भारत दुनियां में दूसरी सबसे अधिक अंग्रेजी बोलने वाले लोगों की संख्या वाला देश है। गौरतलब है कि देश में एक बड़ी आबादी ऐसी हैं जो अंग्रेजी बोलने और समझने में पूरी तरह से असमर्थ हैं, इसके बावजूद हमारे देश के अधिकतर कामकाजी दफ्तरों में अंग्रेजी का ही प्रचलन है। उच्च न्यायालयों तथा सर्वोच्च न्यायालय के कामकाज और फैसले सारे अंग्रेजी में ही होते हैं जिसका प्रभाव इन 90 प्रतिशत लोगों पर पड़ता है। इन लोगों को पूरी तरह से वकील अथवा अधिकारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। अतः वादी तथा प्रतिवादी दोनों को आगे की प्रक्रिया समझने में काफी दिक्कत होती है अथवा समझ ही नहीं आती। आज भारत ही नहीं विदेशी भी हिन्दी भाषा को अपना रहे हैं तो फिर हम देश में रहकर भी अपनी भाषा को बढ़ावा देने के बजाय उसको खत्म करने पर क्यों तुले हैं ? सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई भारत सरकार की राजभाषा में क्यों नहीं ? भारत के संविधान में लिखा है कि अंग्रेजी सिर्फ राजभाषा को सहयोग करेगी। देश के संवैधानिक पद पर बैठने वालों के लिए भारत सरकार की राजभाषा जानना अनिवार्य क्यों नहीं होना चाहिए? गजब है हमारा देश ! सजा सुनाई जाती है, अदालत में बहस होता है, पर दोषी और दोष लगाने वाले को यह पता ही नहीं चलता कि यह लोग क्या बहस कर रहे हैं। कभी अदालत में जाकर देखिए, कटघरे में खड़ा व्यक्ति कभी अपने वकील कभी विपक्षी वकील तो कभी जज को देखता रहता हैं समझने की कोशिश करता। बाहर आकर पूछता है क्या हुआ? इस अवस्था को हम क्या न्याय मानेंगे? 
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आजादी के पश्चात यह निर्णय लिया गया था कि 1965 तक अंग्रेजी को काम में लिया जायेगा, साथ में हीं सभी विभागों में हिंदी के विकास तथा प्रचार-प्रसार के लिए उचित कदम उठाये जाएंगे और इसके पश्चात् अंग्रेजी हटा दिया जायेगा। परंतु 1963 के राजभाषा अधिनियम के तहत हिन्दी के साथ-साथ अंग्रेजी को भी शामिल कर लिया गया। 

एक देश एक भाषा का और हिंदी

      अगर हम हिंदी के प्रति गम्भीर होकर हिंदी भाषा को उसका देश में सर्वोच्च स्थान दिलाना चाहते हैं एक देश एक भाषा के सपनों को साकार करने चाहते हैं तो इसके लिये हमारे राजनैतिक नेतृत्व को, सभी संवैधानिक संस्थाओं को प्रथम भाषा के रूप में हिंदी को अपनाने पर जोर देना होगा और राष्ट्र के तीन प्रमुख स्तम्भ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में हिंदी भाषा को प्राथमिकता देनी होगी, सभी राज्यों के उच्च न्यायालय में उस राज्य की राजभाषा और देश की राजभाषा में सुनवाई होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी बहस तथा फैसले हों। जिस दिन भारत का सर्वोच्च न्यायालय नीतिगत फैसले हिंदी में देना शुरू कर देगा, आम नागरिकों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता का स्तर आज के मुकाबले ज्यादा बढ़ जाएगा। आज हिंदी भाषा को भारत के जन-जन की भाषा बनाने के लिये, भारत में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की भाषा बनाने के लिए इसके प्रति उदार होकर विचार करने की जरूरत है यदि पूरे देश के लोग एक भाषा को जानेंगे समझेंगे तो एक प्रदेश के व्यक्ति का दूसरे प्रदेश के व्यक्ति के साथ सम्पर्क जुड़ सकेगा जिससे विकास के रास्ते खुल सकेंगे।
         हिंदी भाषा के प्रयोग पर बल देते हुवे पिछले दिनों एक देश - एक टैक्स, एक देश - एक चुनाव…..के तर्ज पर ‘एक देश - एक भाषा’ पर अपना विचार प्रकट करते हुवे अमित शाह जी ने कहा था भारत में हर भाषा का अपना महत्व है लेकिन ये आवश्यक है कि देश में एक राष्ट्र भाषा हो, जो विश्व में देश को अलग पहचान दिला सके। दक्षिण भारत के कई नेताओं ने शाह से बयान वापस लेने की मांग शुरु कर दी जबकि कर्नाटक में तो सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरु हो गये। सोशल मीडिया में हिंदी के खिलाफ हैशटैग ट्रेंड करने लगे। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार हिंदी को जबरदस्ती थोप रही है और यह उचित नहीं है। मौजूदा सरकार ने विदेशों में हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए अनेक प्रयास किये हैं, फिर भी उनके शासन में यदि देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठापित नहीं किया जा सका तो भविष्य में इसकी अपेक्षा दूसरी सरकारों से कम हीं है।
           हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान और समाजसेवी डॉ. फादर कामिल बुल्के ने कहा था  "संस्कृत मां, हिन्दी गृहिणी और अंग्रेजी नौकरानी है।" आज हिंदी पर अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव से हिंदी की स्थिति इसके विपरीत होती जा रहा है। अंग्रेजी का प्रभाव इसी तरह बढ़ता गया और पूरे देश में हिंदी स्वीकार्यता के लिए समय पर उचित उपाय नहीं किये गए तो वो दिन दूर नहीं जब हिंदी अपने हीं देश में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाएगी।
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          आज कल अंग्रेजी हमारे समाज में इतना प्रभावकारी हो गया है की गरीब तबके के लोग भी लाख मुसीबतें झेल कर महंगे अंग्रेजी स्कूल में ही अपने बच्चे को भर्ती करा कर उसे पढ़ाने का बंदोबस्त करते हैं। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी की घुसपैठ बढ़ती जा रही है और ‘हिंग्लिश’ यानी हिंदी में अंग्रेजी के मिलावट को लेकर लोग गर्व करते दिख रहे हैं। लोग अपनी बात को प्रभावी बनाने के लिए अनावश्यक रूप से अंग्रेजी शब्दों को ठूंसते रहते हैं।
        सरकारी संस्थाओं, कार्यालयों तथा उपक्रमों में अंग्रेजी के बढ़ते प्रभुत्व को देखते हुवे यह कहा जा सकता है की सरकारें हिंदी के प्रसार के प्रति संवेदनशील नहीं रहीं है। सवाल उठता है की आजादी के सात दशक बाद भी हिंदी को सम्मान नहीं मिलेगा तो फिर कब मिलेगा?

हिंदी पर महापुरुषों के विचार


राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी

मैं दुनिया की सब भाषाओं की इज्जत करता हूँ, परन्तु मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो, यह मैं नहीं सह सकता। - विनोबा भावे

हिंदी उन सभी गुणों से अलंकृत है जिनके बल पर वह विश्व की साहित्यिक भाषाओं की अगली श्रेणी में सभासीन हो सकती है। - मैथिलीशरण गुप्त

जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - डॉ. राजेन्द्रप्रसाद

राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। - महात्मा गाँधी

यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बोस

यह महात्मा गाँधी का प्रताप है, जिनकी मातृभाषा गुजराती है पर हिन्दी को राष्ट्रभाषा जानकर जो उसे अपने प्रेम से सींच रहे हैं। - लक्ष्मण नारायण गर्दे

हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। - डॉ. राजेंद्रप्रसाद

हिंदी द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। - स्वामी दयानंद सरस्वती

हिंदी विश्व की महान भाषा है। - राहुल सांकृत्यायन

दक्षिण की हिन्दी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। - के.सी. सारंगमठ

राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। - माखनलाल चतुर्वेदी

विदेशी भाषा का किसी स्वतंत्र राष्ट्र के राजकाज और शिक्षा की भाषा होना सांस्कृतिक दासता है। - वाल्टर चेनिंग


बिना मातृभाषा की उन्नति के देश का गौरव कदापि वृद्धि को प्राप्त नहीं हो सकता। - गोविंद शास्त्री दुगवेकर