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Sunday, 15 March 2020

कोरोना वाइरस(covid 19) के कारण टोक्यो ओलम्पिक(Tokyo Olympic) 2020 रद्द होने के कगार पर।

कोरोना वायरस के कारण टोक्यो ओलम्पिक 2020 रद्द!


कोरोना वाइरस (कोविड 19) के कहर को लेकर न केवल दुनियां भर के लोगो में दहशत व्याप्त है बल्कि इसके कारण सैकडों देशों को लाखों-करोडों डॉलर का नुकसान उठाना पडा है। दुनियाभर के पर्यटन उधोगों की कमर टूट गई है। दुनियाभर के शेयर बाजार लगातार गिर रहे हैं। कई खेल प्रतियोगितायें रद्द हो चुकी है। भारत में भी इसके कारण दर्जनों परीक्षायें स्थगित कर दिए गए हैं, सैकडों मंदिर, दफ्तर, हॉल-मल्टीप्लेक्स, स्कूल, पुरुस्कार समारोह अनिश्चित काल के लिए बंद या फिर स्थगित कर दिए गए हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच चलने वाली मैत्री और बंधन एक्सप्रेस को रद्द कर दिया गया है और अब इसके कारण दुनियां की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलम्पिक (टोक्यो ओलम्पिक 2020) रद्द होने के कगार पर है। 

ओलम्पिक खेल

ओलम्पिक दुनियां की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता है। प्रत्येक चार वर्ष के अन्तराल में होने वाले खेल के इस महासमर की शुरुआत प्राचीन ग्रीस से हुई जिसमें वर्तमान में 200 से अधिक देश के हजारों खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं। ओलम्पिक का इतिहास सैकड़ों सालों का रहा है। फ्रांसीसी शिक्षाशास्त्री और इतिहासकार पीयरे डी कोबेर्टिन को अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के संस्थापक और आधुनिक ओलंपिक खेलों के जनक मानें जाते हैं। हर चार साल के अंतराल में होने वाले इस प्रतियोगिता के सफल आयोजन के लिए मेजबान देश मेजबानी मिलते ही जुट जाता है। आधुनिक ओलिंपिक के आज तक के इतिहास में ऐसा सिर्फ तीन बार ही हुआ है, जब इन खेलों को रद्द किया गया, मगर तीनों ही बार खेल विश्व युद्द के कारण रद्द हुए हैं।

बर्लिन ओलिंपिक 1916

ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक 1916 जो जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित था, प्रथम विश्व युद्ध के कारण इसे रद्द करना पड़ा। इसके दो दशक  बाद बर्लिन ने ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक 1936 का आयोजन किया, जो दूसरे विश्व युद्द से पहले आखिरी ओलिंपिक था।

टोक्यो ओलिंपिक 1940

ग्रीष्मकालीन ओलंपिक 1940 का आयोजन जापान के टोक्यो में निर्धारित था। 1940 में 21 सितंबर से 6 अक्टूबर तक ओलम्पिक के इस 12वें सीजन का आयोजन होना था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण इसे पुननिर्धारित करके 20 जुलाई से 4 अगस्त के बीच फिनलैंड में आयोजित करवाने का फैसला किया गया। मगर दूसरे विश्व युद्द के कारण विश्व के देशों की अस्थिरता के कारण आखिरकार इस ओलिंपिक को रद्द करना पड़ा। इसके बाद फिनलैंड ने 1952 में और टोक्यो ने 1964 में ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक की मेजबानी की।

लंदन ओलिंपिक 1944 

ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक के 13वें सीजन की मेजबानी लंदन को मिली थी, मगर दूसरे विश्व युद्द के कारण यह ओलिंपिक भी रद्द हो गए थे। इसके बाद लंदन ने 1948 ओलिंपिक की मेजबानी की थी।

कोरोना वायरस(कोविड 19) के कारण!

टोक्यो को ओलम्पिक की मेजबानी का मौका पहली बार 1940 में मिला था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण ओलम्पिक के इस सीजन का आयोजन रद्द हो गया। जिसके बाद 1964 में पहली बार टोक्यो में ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक का आयोजन हुआ जो ओलम्पिक का 18वां सीजन था। पुनः टोक्यो में ओलम्पिक का आयोजन 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 के बीच प्रस्तावित है जो आधिकारिक तौर पर आधुनिक ओलम्पिक का XXXII ओलम्पियाड है। लेकिन विश्व में कोरोना(कोविड 19) के दिन-प्रतिदिन बढ़ते संक्रमण से यह आयोजन रदद् होने के कगार पर है।
हाल हीं में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना को  वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है। चीन के वुहान शहर से इसका संक्रमण शुरू होकर यह वायरस दुनियां के 100 से अधिक देशों को अपने संक्रमण का शिकार बना चुका है। जापान भी इससे अछूता नहीं रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार जापान में भी कोरोना के सैकडों मामले सामने आये है। इस वायरस का संक्रमण बहुत तेजी से फैलने के कारण पूरी दुनियां के लोग इसे लेकर दहशत में हैं। दुनियाभर में सिनेमा हॉल, स्कूल, कॉलेज भीड़भाड़ वाले मॉल जैसे सार्वजनिक स्थान बंद किए जा रहे हैं। विश्व की ऐसी परिस्थिति में टोक्यो में ओलम्पिक का आयोजन उचित नहीं जान पड़ता। हाल हीं में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा है कोरोना वाइरस के संक्रमण से पूरी दुनियां पीड़ित है ऐसे में टोक्यो ओलम्पिक खेलों को कोरोना वाइरस से बचने के लिए स्थगित कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि खाली स्टेडियम में आयोजन से बेहतर है कि इन्हें एक साल स्थगित कर दिया जाए। 
    हालांकि आज तक किसी महामारी या फिर स्वास्थ्य कारणों से ओलिंपिक रद्द नहीं हुए हैं। ऐसे में यदि टोक्यो ओलम्पिक 2020 रदद् होता है तो किसी महामारी या फिर स्वास्थ्य कारणों से पहली बार किसी खेल के आयोजन का इन कारणों से रद्द होना होगा।



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टोक्यो ओलम्पिक  2020 : भारत की उम्मीदें 

Saturday, 8 February 2020

आत्महत्या (Suicide) क्यों करते हैं?


आत्महत्या (Suicide) क्यों करते हैं?

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आत्महत्या का अर्थ होता है स्वयं को मारना अर्थात अपना जीवन समाप्त कर लेना। आत्महत्या क्यों करते हैं। आत्महत्या जैसे कदम उठाने से पहले इंसान के दिमाग में क्या चलता रहता है। क्या केवल कमजोर दिल वाले आत्महत्या करते हैं?

आत्महत्या : यह एक ऐसी घड़ी होती है जब इंसान अपने जीवन से इतना हारा हुवा महसूस करता है की अपनी हीं साँसों को पूर्णविराम देने का फैसला कर लेता है। वह नकारात्मक विचारों से भर जाता है उन्हें जीवन को ऐसे दुखों के महासागर के रूप में देखने लगता है, जिनका कभी अंत न होने वाला हो। वह हर वक्त यही सोचता रहता है की इस दुख से मुक्ति का आत्महत्या के सिवाय कोई और रास्ता नहीं है। ऐसे लोग ख़ुद को बेकार मानने लगते हैं, धीरे-धीरे उन्हें लगने लगता है कि उनके आसपास के लोग उनसे नफरत करते हैं कोई उनसे प्यार नहीं करता, उन्हें अपना जीवन नीरस लगने लगता है वह ज़िंदगी की बेहतरी का रास्ता अपने जीवन की समाप्ति में ही देखने लगता है। आत्महत्या इस फैसले को लेने से पहले इंसान का दिमाग और सोच शायद उस चरम सीमा तक पहुँच जाता हैं जिसके बाद उसे कोई रास्ता नहीं सूझता। उसके अंदर की समझ मर जाती है और वो जिंदगी और मौत के बीच का फर्क भुला देता है।
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(PC : PIXABAY)

 कहते हैं आत्महत्या से इंसान बाद में मरता है उनकी मति पहले मर जाती है। कभी-कभी कुछ लोग परेशानी, क्रोध, निराशा और शर्मिंदगी से भरकर ऐसा क़दम उठा लेते हैं क्योंकि ऐसे परिस्थिति में उनकी मनोस्थिति कुछ समय के लिए स्थिर नहीं रह पाती और उस क्षण वह आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। कुछ लोगों में आत्महत्या करने के विचार बड़े तीव्र होते हैं वह छोटी-छोटी परेशानी में आकर भी आत्महत्या जैसे कदम के बारे में सोचने लगते है तो कुछ में ऐसे विचार क्षणिक होते हैं, जिन्हें बाद में अपने ऐसे विचार पर आश्चर्य भी होता है।

आत्महत्या के पीछे कारण

        आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण डिप्रेशन को माना जाता है। इस प्रतियोगी भागदौड़ भरी दुनियां में इंसानों में एक दूसरे से श्रेष्ठ बनने और दिखने की होड़ लगी रहती है, उन्हें अपनी इच्छा के अनुरूप चीजें नहीं मिलती है, तब वह डिप्रेशन में चला जाता है और जब समय पर इस अवसाद से छुटकारा नहीं मिल पाता है तो वह आत्महत्या जैसे कदम उठा लेता है।
(PC : PIXABAY)

 विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लुएचओ) के एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में हर वर्ष 80 लाख लोग आत्महत्या के कारण मरते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनियां में हर 40 सेकेंड में एक मृत्यु आत्महत्या की वजह से होती है।     
        भारत की बात करें तो राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के एक आंकड़े के अनुसार भारत में प्रति वर्ष एक लाख तीस हजार से अधिक लोगों की मृत्यु आत्महत्या के वजह से होती है। देखा गया है पारिवारिक समस्याओं, लाइलाज बीमारियों, शादी संबंधित समस्याओं, कर्ज और दिवालियापन से तंग आकर मुख्यतः लोग आत्महत्या करते हैं।
       कहते हैं आत्महत्या करने वाले कमजोर दिल, खराब परिस्थितियों से हार मान जाने वाले बुझदिल इंसान होते हैं लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसे व्यक्तियों को भी आत्महत्या कर अपना जीवन समाप्त करते पाया गया है जो एक मजबूत इच्छाशक्ति और बड़े विचारवान होते हैं। ऐसे कई लोग हैं जो अपने पूरे जीवनकाल लोगों को एक बेहतर जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहे। लोगों को परेशानियों और जीवन में आने वाली कठिनाइयों पर विजय पाने के लिए मार्ग दिखाते रहे लेकिन जब अपने जीवन में कठिनाई आई तो हार मानकर आत्महत्या जैसे कदम उठा लिए। 
    आध्यात्मिक गुरु भय्यूजी महाराज को भला कौन नहीं जानता। पीएम नरेंद्र मोदी, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, राज ठाकरे, लता मंगेशकर, आशा भोंसले और अनुराधा पौडवाल जैसे कई बड़े नेता, उधोगपति, अभिनेता और गायक कभी उनके आश्रम की शोभा बढ़ा चुके हैं। भय्यूजी महाराज जीवन भर लोगों को परेशानियों में मन की स्थिरता बनाये रखने तथा जीवन की कठिनाइयों से न घबराकर उनपर विजय पाने के लिए प्रेरित करते रहे लेकिन अन्ततः अपने हीं जीवन की कठिनाइयों से हार कर आत्महत्या कर बैठे। इतिहास में अनेकों उदाहरण हैं जिन्होंने सशक्त व्यक्तित्व के होने के वावजूद आत्महत्या जैसे कदम उठाकर अपने जीवन समाप्त कर लिया हो। 
       हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला का आत्महत्या बहुत सुर्खियों में रहा था। इस घटना के बाद देशभर में सैकड़ों विरोध प्रदर्शन हुए थे। रोहित वेमुला ने यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में 17 जनवरी 2016 को आत्महत्या कर लिया था। कहा जाता है कि विश्वविद्यालय परिसर में अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच हुए मारपीट के बाद आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के नेताओं पर हुवे कार्रवाई से दुखी था। इस कार्रवाई में रोहित समेत चार छात्रों को विश्वविद्यालय से निलम्बित कर दिया गया था तथा छात्रावास भी खाली करा दिया गया था। रोहित समाजशास्त्र से पीएचडी का छात्र था लेकिन कठिन परिस्थितियों में अपने को टूटने से नहीं बचा सका।
      ग्‍लैमर और शोहरत से चकाचौंध बॉलीवुड अपने भीतर कई रहस्‍यों को छिपाये हुए है। यहाँ आये दिन कलाकारों के प्रेम-प्रसंग, धोखा, ब्रेकअप और लड़ाई-झगडे आम बात हो गई है और इन परेशानियों से तंग आकर दर्जनों बड़े-बड़े कलाकारों ने अपना जीवन समाप्त कर लिया है। पिछले कुछ दशकों में सिल्क स्मिता, परवीन बॉबी, जिया खान, नसिफ़ा जोसेफ, प्रत्युषा बनर्जी जैसे शीर्ष कलाकारों की आत्‍महत्‍या ने लोगों को इस चमचमाती दुनियां के बारे में बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया है।
           कैफे कॉफी डे के संस्थापक वी. जी. सिद्धार्थ ने 2014 में एक इंटरव्यू में कहा था की "कुछ कर गुजरना है तो संकल्प के साथ करो और आसानी से हार मत मानो।" लेकिन दुर्भाग्यवश वे अपने जीवन की कठिनाइयों से हार मान गए और इस दुनियां को अलविदा कह गए। कहते हैं वे अपनी कंपनी के घाटे तथा एक अधिकारी के उत्पीड़न से मानसिक तनाव में थे।
वी. जी. सिद्धार्थ (PC : ट्विटर)

       पूरी दुनियां में 10 सितंबर को वर्ल्ड सूसाइड प्रिवेंशन डे मनाया जाता है ताकि आत्महत्या के कारणों को समझा जा सके और लोगों को आत्महत्या जैसा जानलेवा क़दम उठाने से रोका जा सके।





Wednesday, 8 January 2020

टोक्यो ओलम्पिक 2020 से उम्मीदें और खेलों में भारत के पिछड़ेपन का कारण


टोक्यो ओलम्पिक 2020 में भारत


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टोक्यो ओलम्पिक 2020 : विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता ओलम्पिक का आयोजन इस बार टोक्यो में होने जा रहा है। टोक्यो ओलम्पिक 2020 के आयोजन में अब 6 माह शेष है। पिछले कुछ सालों में भारत की स्थिति सभी खेलों में सुधरी है। टोक्यो ओलम्पिक से भारत को बहुत उम्मीदें है। अब देखना है ये उम्मीदें रंग लाती हैं? आखिर क्या है भारत के खेलों में पिछड़ेपन का कारण?


ओलम्पिक (olympic) विश्व की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता है। ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता का प्रारंभ ओलंपिया में होने के कारण इन्हें ओलंपिक खेल नाम दिया गया। इन खेलों के प्रतीक चिन्ह में लाल, नीले, हरे, पीले और काले रंगों के पांच वलय दर्शाए गए हैं जो पांच महाद्वीपों अमरीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, एशिया और अफ्रीका का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक चार साल के अंतराल में आयोजित होने वाले दुनियां के इस सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता का आयोजन 2020 में होने जा रहा है, इस खेल महाकुंभ के शुभारंभ में 200 से भी कम दिन शेष बचे हैं। आधिकारिक तौर पर आधुनिक ओलंपिक के इस XXXII ग्रीष्मकालीन ओलम्पियाड की मेजबानी इस बार जापान कर रहा है। अन्तराष्ट्रीय योजनाबद्ध बहु-खेल प्रतियोगिता के इस महासमर का आयोजन 24 जुलाई से 9 अगस्त 2020 के बीच जापान के टोक्यो शहर होने जा रहा है, जिसमें 200 से अधिक देशों के 10 हजार से अधिक खिलाड़ियों के भाग लेने का अनुमान है।

टोक्यो ओलंपिक 2020 के लिए जो दो करेक्टर्स शुभंकर के रूप में अंतिम रूप से चयनित किए गए उनके नाम हैं ‘मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'। ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक का शुभंकर है मिराइतोवा। यह मिराई व तोवा शब्दों से बना है जिसका अर्थ होता है अनन्त व शाश्वत। टोक्यो पैरालम्पिक 2020 का शुभंकर है सोमाइटी, यह एक  पिंक चेक वाला शुभंकर है।
Tokyo Olympic 2020 mascot
मिराइतोवा’ और ‘सोमाइटी'


ओलम्पिक में भारत का इतिहास


भारत ने ओलम्पिक में पहली बार 1900 में फ्रांस में हुए द्वितीय ओलम्पिक में भाग लिया, इसमें भारत की ओर से भाग लेते हुए नार्मन प्रिजार्ड (आँग्ल इंडियन) ने एथलेटिक्स स्पर्धा में दो रजत पदक प्राप्त किया। लेकिन फिर 1920 तक किसी टीम प्रतिस्पर्धा में भाग नहीं लिया। 1920 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में देश ने पहली बार एक टीम भेजी और उसके बाद से हर ग्रीष्मकालीन ओलपिंक खेलों में भाग लिया है। टोक्यो ओलंपिक 2020 शुरू होने से पहले भारत के खाते में अभी तक कुल 28 ओलम्पिक पदक हैं। 1920 से 1980 के बीच हुए बारह ओलंपिक खेलों में लम्बे समय तक भारत की राष्ट्रीय हॉकी टीम का दबदबा बना रहा। इस बीच हुए बारह ओलंपिक में से भारत ने ग्यारह में पदक जीते जिनमें 8 स्वर्ण पदक थे, इसमें 1928-1956 तक छह स्वर्ण पदक लगातार जीते थे। बीजिंग ओलम्पिक 2008 में अभिनव बिंद्रा द्वारा 10 मीटर एयर रायफल (निशानेबाजी) में जीता गया स्वर्ण पदक किसी व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत का पहला स्वर्ण पदक है।
Abhinav bindra, Beijing Olympic 2008, gold medalist
अभिनव बिंद्रा

ओलम्पिक इतिहास में भारत के लिए लंदन ओलम्पिक 2012 सबसे सफल रहा जिसमें भारत ने पहली बार 6 ओलम्पिक पदक (3 रजत, 3 कांस्य) जीता और पदक तालिका में 55वां स्थान सुनिश्चित किया। पिछले 2016 के रियो ओलम्पिक में भारत की ओर से 118 सदस्यीय टीम प्रतिस्पर्धा में शामिल हुए जिसमें कुल दो पदक (एक रजत, एक कांस्य) प्राप्त हुए। पिछले कुछ ओलम्पिक में कुश्ती, निशानेबाजी, मुक्केबाजी, भारोत्तोलन, बैडमिंटन जैसे कुछ खेलों में भारत अच्छा करता रहा है और जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स जैसे कुछ खेलों में अच्छे प्रदर्शन के कारण टोक्यो ओलम्पिक में पदकों के संख्या में बढ़ोतरी की उम्मीदें बढ़ी है।
ओलम्पिक प्रतीक चिन्ह, Olympic



आखिर क्यों...?


70 साल से अधिक हो गए है देश को आजाद हुए आज हमारा देश शिक्षा हो या विज्ञान या फिर अर्थव्यवस्था हर क्षेत्र में लगातार तरक्की कर रहा है। लेकिन इतनी जनसंख्या के बावजूद खेल प्रतिस्पर्धाओं में हमारी स्थिति सुधरी नहीं है, ओलंपिक हो या कॉमनवेल्थ हमारी स्थिति बहुत प्रशंसनीय नहीं रही है। इतनी जनसंख्या के बावजूद भी आखिर क्यों भारत खेल प्रतिस्पर्धाओं में इतना पिछड़ा हुवा है, आखिर क्यों इतने योग्य खिलाडी नहीं तैयार कर पाते हम जो अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में भारत को गौरवान्वित कर सके। दुनियां में दूसरी सबसे अधिक आबादी वाले देश हैं हम, फिर भी दुनियां के शीर्ष खेल के प्रतिस्पर्धाओं में हम पदक तालिका सूचि में सम्मानजनक जगह नहीं बना पाते। 135 करोड़ की आबादी के लगभग हम पहुँच गए है फिर भी खेलों में हमारी स्थिति कितनी दयनीय है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की जमैका, क्यूबा, क्रोएशिया, नीदरलैंड, हंगरी, केन्या, स्पेन, दक्षिण कोरिया जैसे दर्जनों देश ओलम्पिक पदक तालिका में भारत से ऊपर रहते हैं उनमें से अधिकतर देशों के न सिर्फ आबादी और क्षेत्रफल भारत से कम है बल्कि आर्थिक दृष्टि से भारत से बहुत पिछड़े हैं।


खेलों में पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार कौन?


खेलों में भारत के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार तो बहुत कारक हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है "राजनीति"।  भारत में सभी खेल संगठनों में महत्वपूर्ण पदों पर राजनेता बैठे हुए हैं जिनको न उस खेल की समझ है और न हीं उसका उस खेल में कोई इतिहास रहा है, उनको सिर्फ अपनी जेबें भरने से मतलब है। क्षणिक राजनीतिक महत्वाकांक्षा साधने के लिए ऐसे लोगों को खेल संगठनों का अध्यक्ष और सचिव नियुक्त कर दिया जाता है जिन्हें खीलाड़ियों को कोई सुविधा उपलब्ध कराने में उनकी खास दिलचस्पी नहीं रहती। अगर इन संगठनों में नेताओं को हटाकर पूर्व खिलाड़ियों को रखें तो हर खेल की स्थिति में सुधार होगा, क्योंकि एक खिलाड़ी की मानसिकता और जरूरतों को उस दौर से गुजर चुका या उससे लगाव रखने वाला व्यक्ति बेहतर समझ सकता है।
        दूसरा कारण है खेलों के प्रति सरकार की उदासीनता। आजादी के बाद से हीं कभी भी सरकारें खेल के प्रति गंभीर नहीं रही है। आज स्थिति ऐसी हो गई है एक अभिभावक को विश्वास नही होता की खेल में भी उसके बच्चे का कॅरियर बन सकता है। एक सर्वेे के मुताबिक भारत में दस लोगों में से केवल एक भारतीय युवा खेल को करियर बनाने के लिए इच्छुक है। ऐसा क्यों है? इसके जवाब में लोगों ने बताया कि वो खेल को एक ऐसी गतिविधि के रूप में मानते हैं जो स्कूल तक ही सीमित है और इसमें आगे कोई भविष्य नहीं। क्योंकि देश में स्पोर्ट्स ट्रेनिंग महँगे हैं और आसानी से उपलब्ध नहीं है और सबसे बड़ा कारण उन्हें खेल में अपना कॅरियर सुरक्षित नहीं लगता। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुके कुछ खिलाड़ियों को आर्थिक तंगी में अपना मेडल बेचता देख युवाओं को खेल में एक सुरक्षित भविष्य नजर नहीं आता है। सरकार को एक खिलाड़ी के बेहतर और सुरक्षित भविष्य के लिए ऐसा कुछ करने की जरूरत है जो युवाओं को खेल-कॅरियर की असुरक्षा भावना को भुलाकर खेल के प्रति आकर्षित करे। स्पोर्ट्स-बजट के नाम पर जितना पैसा सरकार हर साल देती है उससे प्रखंड और जिला स्तर पर स्पोर्ट्स सेंटर बनाने के साथ हीं देश में सुविधा और आर्थिक तंगी के कारण अपना खेल में सुधार नहीं कर पा रहे खिलाड़ियों को ढूंढकर तराशने में लगाया जाय तो हमारी स्थिति सुधर सकती है। इसके अतिरिक्त सरकार को खेल बजट बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि विश्व स्तर के खिलाडी तैयार करने के लिए खिलाड़ियों को अच्छी सुविधाओं के साथ-साथ अच्छे तकनीक की भी जरूरत है। युवाओं को खेल के प्रति आकर्षित करने के लिए ग्राम-पंचायत स्तर पर छोटे-छोटे स्पोर्ट्स सेंटर बनाने होंगे जिससे बचपन से ही युवाओं का खेल के प्रति आकर्षण बढ़े और दिन प्रतिदिन उसका खेल निखरता जाए। स्कूलों में ऐसी व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई जाएं जिससे बच्चे खेल को करियर के रूप में लेने की सोचें।
     खेलों में भारत के पिछड़ेपन के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे भारत में क्रिकेट को जितना बढ़ावा दिया जाता रहा है समान रूप से दूसरे खेलों को भी दिया जाता तो शायद आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की खेल प्रतिस्पर्धाओं में स्थिति और बेहतर होता।
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हर जगह सिर्फ और सिर्फ क्रिकेट का प्रचार किया जाता है। क्रिकेट में भारत की स्थिति मजबूत होने का एक कारण इस खेल में कम उपकरण की जरूरत होना भी है बच्चे बचपन से हीं एक बल्ला और एक गेंद लेकर गली-मोहल्ले में कहीं भी शुरू हो जाते हैं लेकिन यदि कोई तैराकी, टेनिस, बैडमिंटन में कॅरियर बनाना चाहता है तो कोई प्रोत्साहन हीं नहीं मिलता।


खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना

भारत में खेलों की स्थिति व स्तर में सुधार के लिए भारत सरकार द्वारा लाया गया खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना बहुत हीं प्रसंशनीय है। हमारे देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, किन्तु खिलाड़ियों को उचित व्यवस्था और बेहतर तकनीक के अभाव में अच्छा प्रदर्शन करना काफी चुनौतियों भरा होता है। देश में खेलों को बढावा देने और नई प्रतिभाओं को तलाशने के उद्देश्य से भारत सरकार के खेल मंत्री श्री राज्यवर्धन सिंह राठौर द्वारा राजीव गांधी खेल योजना, शहरी खेल संरचना योजना, ग्रामीण खेल योजना और राष्ट्रीय खेल प्रतिभा खोज योजना को मिलाकर इनके स्थान पर ‘खेलो इंडिया’ कार्यक्रम योजना पेश किया गया है।

इस खेल कार्यक्रम योजना के तहत सरकार ने 10 साल की उम्र से ही प्रतिभावान खिलाड़ी बच्चों का पोषण करने का फैसला किया है। सरकार हर साल 1000 बच्चों को चयन करेगी और उन्हें अगले 8 साल तक 5 लाख रुपए सालाना छात्रवृत्ति देगी ताकि वह अपने खर्चे उठा सकें और केवल खेलों पर ही ध्यान दे सकें।
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खेलो इंडिया के एक कार्यक्रम में खेल मंत्री किरण रिजिजू

इस कार्यक्रम का लक्ष्य देश में 20 विश्वविद्यालयों को खेल की उत्कृष्टता के केंद्र के रूप में बढ़ावा देना है ताकि प्रतिभाशाली खिलाड़ी अपनी शिक्षा के साथ समझौता किए बिना प्रतियोगी खेलों में आगे बढ़ने में सक्षम हो पाए। इस योजना में आवेदन करने के लिए उम्र 8 वर्ष से 12 वर्ष के बीच होनी चाहिए। खेलो इंडिया कार्यक्रम योजना की रूपरेखा से लगता है यदि सरकार योजना को सही से क्रियान्वित करने में सफल रहती है तो आगामी वर्षों में यह योजना भारत में खेल के विकास में एक क्रांति साबित होगी।
     बहरहाल देश मे खेलों की वर्तमान स्थिति जो भी हो उम्मीद है टोक्यो ओलम्पिक में भारतीय खिलाड़ी अपने अच्छे प्रदर्शन से अधिक से अधिक संख्या में पदक जीतकर देश को गौरवान्वित करेंगे...




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Wednesday, 11 December 2019

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती

भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती


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  1. 21वीं शताब्दी में भारत जहाँ दुनियां में एक बहुत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रही है, वहीं भारत में प्रदूषण की समस्या एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है ,भारत में प्रतिवर्ष लाखों लोगों की मौत प्रदूषण के कारण हो रही है। समय पर यदि दूषित होते पर्यावरण को रोकने का सही उपाय नही किया गया तो भविष्य में जीवन को प्रभावित करने वाले कारकों में सबसे शीर्ष पर प्रदूषण हीं होगा...

बढ़ता प्रदूषण - सिमटता जीवन

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 2019 लिए जारी रिपोर्ट में दुनिया के 15 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में इस बार भी भारत के 14 शहर शामिल हैं। इनमें पहले स्थान पर कानपुर के बाद राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का फरीदाबाद दूसरे और बनारस तीसरे नंबर पर है। भारत दुनिया का सबसे प्रदूषित देश है जहां हर साल लगभग 20 लाख लोग प्रदूषित हवा की वजह से मर रहे हैं। दुनिया में प्रदूषित हवा से होने वाली हर 4 मौतों में से एक भारत में होती है।
          प्रदूषण की इस खतरनाक स्थिति को लेकर पहले भी चिंता ज़ाहिर की गई थी। पिछले साल की तरह इस साल भी भारत के सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की बिक्री में कमी लाने की कोशिश की, लेकिन कोर्ट के आदेश का असर कम ही दिखा क्योंकि कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश को धार्मिक दृष्टिकोण से देखने लगते है उन्हें लगता है ये प्रतिबंध उनके धार्मिक आजादी पर हमला है।
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    प्रदूषण के प्रभाव 


       भारत में बड़े शहरों से इतर अब छोटे-छोटे शहरों में भी हवा सांस लेने लायक नहीं है। उसमें घुला जहर लोगों को न सिर्फ धीरे-धीरे बीमार कर रहा है बल्कि उनकी मौत की वजह भी बन रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब 66 करोड़ लोग ऐसी जगहों पर रहने को मजबूर हैं जहां हवा में प्रदूषण की मात्रा राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है। भारतीय मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने पिछले साल दिल्ली में वायु प्रदूषण को देखते हुए स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा करते हुए लोगों से घरों के बाहर न निकलने की अपील की थी। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल दिल्ली की हवा में सांस लेना दिनभर में 44 सिगरेट पीने जितना खतरनाक बताया था।

भारत मे प्रदूषण मापक सूचकांक

      वायु की गुणवत्ता की माप के लिए विश्व के विभिन्न देशों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AIR QUALITY INDEX) बनाये गये हैं, ये सूचकांक देश में वायु की गुणवत्ता को मापते हैं और बताते हैं कि वायु में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा तय किए गए मापदंड से अधिक है या नहीं।
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 इसके माप के लिए AQI(वायु गुणवत्ता सूचकांक) और PM(पार्टिकुलेट मैटर) जैसे शब्द इस्तेमाल होते है। पीएम 2.5 प्रदूषण में शामिल वो सूक्ष्म संघटक है जिसे मानव शरीर के लिए सबसे ख़तरनाक माना जाता है। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना। हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम 10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है। पिछले दो-तीन सालों से अंतिम तीन महीनों में दिल्ली और उसके समीपवर्ती शहरों में प्रदूषण खतरनाक स्तर पर देखा जा रहा है, इसका कारण पंजाब-हरियाणा में धान की पराली को जलाना बताया जाता है, साथ ही नवम्बर में दीवाली के समय शहरों में अंधाधुंध पटाखे छोड़े जाने के कारण हवाएं और जहरीली हो जाती है। इन महीनों में वायु गुणवत्ता सूचकांक(AQI) अति खतरनाक(350+) स्तर तक पहुँच जाता है। 

     राजधानी दिल्ली में प्रदूषण

     राजधानी दिल्ली और आसपास में बढ़ते प्रदूषण के रोकथाम के लिए दिल्ली सरकार द्वारा ऑड-ईवन स्किम जारी किया किया गया था, एक सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए कहा कि ऑड-ईवन स्कीम प्रदूषण से निपटने का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। कोर्ट ने प्रदूषण के स्थायी निदान के लिए उचित उपाय करने के निर्देश दिए है।
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तीन अलग-अलग दिनों के AQI (दिल्ली)

आंकड़े बताते हैं 80 प्रतिशत भारतीय शहर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानक (60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर औसत) को भी पूरा नहीं करते।
         

    वायु प्रदूषण के प्रभाव

   वायु प्रदूषण के कारण सबसे अधिक मौतें (43 प्रतिशत) फेफड़ों से संबंधित बीमारियों से होती हैं. इनमें कैंसर से 14 और फेफड़ों से संबंधित दूसरी बीमारियों से 29 प्रतिशत मौतें होती हैं. इसके अतिरिक्त ब्रेन स्ट्रोक से 24 और हृदय संबंधी बीमारियों के चलते 25 प्रतिशत मौतें होती हैं।

भारत में प्रदूषण के कारण

          भारतीय शहरों की हवा भी बेतहाशा दौड़ते वाहनों से जहरीली होती जा रही है, सरकार को इसे सीमित व नियंत्रित करने के उपाय जल्दी ही ढूँढने होंगे। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन का धुआं, हवा को जहरीली बना रहा है। ऐसे में भारत की जिम्मेदारी बड़ी और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो जाती है, प्रारंभिक तौर पर हमें हमारे गांवों की हवा को शुद्ध रखने के लिए इस बात का खासतौर से ख्याल रखना होगा कि ईंधन के बतौर लकड़ी, कोयले का कम से कम इस्तेमाल हो। इस दिशा में भारत सरकार का उज्ज्वला योजना जैसी सार्थक पहल सराहनीय है, इस योजना के तहत अभी तक लगभग 8 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं को किफायती दर पर एलपीजी कनेक्शन मुहैया कराया जा चुका है। इससे इन महिलाओं को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने से निजात मिली है।

  प्रदूषण आज वैश्विक समस्या

     प्रदूषण के कारण पूरा विश्व आज भूमंडलीय ऊष्मीकरण जैसे खतरनाक चुनौतियों का सामना कर रहा है, भूमंडलीय ऊष्मीकरण के कारण हर साल पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है, एक आंकड़े बताते है पिछले 100 सालों में विश्व के तापमान में औसत 0.7 डिग्री सेल्सियस की व्रद्धि हुई है और ऋतु परिवर्तन का चक्र अनिशचित हो गया है, कहीं पर सूखा तो कहीं पर बाढ़ सामान्य सी बात हो गयी है। आज ऐसा कोई भी देश नहीं है जो भूमंडलीय ऊष्मीकरण के दुष्प्रभाव से खुद को बचा पाया हो। समय के साथ-साथ पेड़-पौधे व पशु-पक्षियों की बहुत सी प्रजातियाँ लुप्त हो गई हैं और लुप्त होने की कगार पर हैं यदि पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन इसी तरह लगातार होता रहा तो एक दिन मानव जाति के अस्तित्व पर भी प्रश्न चिन्ह लग जायेगा।

           धरती पर ताजे पानी का स्तर हर दिन घटता ही जा रहा है। पृथ्वी पर पीने के पानी की उपलब्धता सीमित है जबकि वो भी इंसानों की गलत गतिविधियों की वजह से प्रदूषित हो रही है। जरा सोचिए कोई अगर 200 साल पहले आज के बारे में कहता की पानी बोतल में बंद करके उच्चे दामों में बेचा जाएगा तो लोग उसे बेवकूफ समझते लेकिन आज ये सच है, हमनें पानी को पीने लायक नही बचा सका, वर्षा के मीठे जल समय पर संचयित नही किया गया परिणाम स्वरूप वो नदियों में बहते हुवे समुद्र में मिल गए। कहीं-कहीं पानी की इतनी कमी है कि लोग नलों के सामने घण्टो तक सैकड़ों मीटर लाइन में लगे रहते है एक बाल्टी पानी के लिए। सच तो ये है कि ईश्वर ने हमें पृथ्वी के रूप में जन्नत दिया था रहने के लिए लेकिन हमलोगों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर करके जहन्नुम बना दिया। अभी समय है सचेत होने का पर्यावरण को बचाने का पेड़ - पौधों को लगाने का...
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नही तो वो दिन दूर नही जब बारिशें नही होंगी, लोग बून्द बून्द पानी के लिए तरशेंगे, पेड़ पौधे उजड़ जाएंगे, लोग ऑक्सीजन की कमी से कुछ सेकेंड की जिंदगी के लिए तरशेंगे...




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