खबरों की समीक्षा, सच्चाई और जनहित ख़बरों के लिए Jantantra.net पर आपका स्वागत है...

Friday, 31 January 2020

बाबूलाल मरांडी : एक शिक्षक से झारखंड के पहले मुख्यमंत्री तक का सफर

बाबूलाल मरांडी : एक शिक्षक से झारखंड के पहले मुख्यमंत्री तक का सफर


Babulal marandi, बाबुलाल मरांडी, bjp, jvm, first cm, झारखंड, jharkhand


बाबूलाल मरांडी एक ऐसी शख्सियत जिनका जिक्र किए बगैर झारखंड का इतिहास लिखना शायद सम्भव नहीं है। दशकों के राजनीतिक संघर्ष के बाद जब 15 नवम्बर 2000 को झारखंड अस्तित्व में आया तो बाबूलाल मरांडी को झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुवा। एक शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत कर झारखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले श्री बाबूलाल मरांडी जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं।

प्रारंभिक जीवन परिचय

बाबूलाल मरांडी जी का जन्म 11 जनवरी 1958 को झारखंड के गिरिडीह जिला के तीसरी प्रखंड के कोदाईबांक नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम छोटे लाल मरांंडी तथा माता का नाम श्रीमती मीना मुर्मू है। वह झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं तथा वर्तमान में झारखंड के धनवार विधानसभा से विधायक हैं।

मरांडी जी की शिक्षा 

श्री मरांडी का प्राथमिक शिक्षा गाँव के हीं प्राथमिक स्कूल में हुई। गिरिडीह कॉलेज गिरिडीह से बीए ऑनर्स की डिग्री ली। कॉलेज के दिनों से हीं उनका झुकाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ बढ़ा। कॉलेज खत्म होने के पश्चात वे कुछ सालों तक एक प्राथमिक विद्यालय में शिक्षण का कार्य किए फिर शिक्षण छोड़कर आरएसएस से पूर्णकालिक जुड़ गए। 
बाबुलाल मरांडी, babulal marandi, first cm jharkhand

उन्हें 1983 में झारखंड के दुमका में संथाल परगना क्षेत्र का विश्व हिन्दू परिषद का संगठन सचिव बनाया गया। 1989 में इनकी शादी शांति देवी से हुई। उनके दो पुत्र हुवे सनातन मरांडी तथा अनूप मरांडी। झारखंड के गिरिडीह के चिलखारी गाँव में एक आदिवासी सांस्कृतिक कार्यक्रम में 26 अक्टूबर 2007 को हुए एक नक्‍सली हमले में छोटे सुपुत्र अनूप मरांडी की मौत हो गई। 

बाबुलाल जी का राजनीतिक जीवन

श्री मरांडी के लंबे समय तक दुमका क्षेत्र में संघ के प्रचार-प्रसार में लगे रहने के कारण वे इस क्षेत्र की जनता के बीच एक जाना माना चेहरा हो गए। 1991 में भाजपा के महामंत्री गोविन्दाचार्य की अगुवाई में भाजपा में शामिल हुए तथा 1991 लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर दुमका लोकसभा से चुनाव लड़े लेकिन दिग्गज शिबू सोरेन से हार गए। 1996 लोकसभा चुनाव में उन्होंने फिर से सोरेन को चुनौती दी। इस बार मात्र 5 हजार वोटों से वो हार गए। लगातार हार के बावजूद भाजपा में बाबूलाल मरांडी का कद बढ़ता गया। 1998 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्हें झारखंड क्षेत्र के भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया और पार्टी उनके नेतृत्‍व में झारखंड क्षेत्र की 14 लोकसभा सीटों में से 12 सीटें जितने में सफल रही। इस लोकसभा चुनाव में उन्होंने शिबू शोरेन को दुमका से हराकर पहली बार संसद पहुँचे। 1999 के चुनाव में उन्होंने शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन को दुमका से हराया। इस लगातार जीत से मरांडी के राजनीति को ताकत मिली। 1999 में अटल सरकार में उन्हें वन पर्यावरण राज्य मंत्री बनाया गया।
Babulal marandi, first cm jharkhand, बाबुलाल मरांडी


अलग झारखंड राज्य निर्माण

15 नवम्बर 2000 को अलग झारखंड राज्य के गठन के पश्चात बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में झारखंड में एनडीए ने पहली सरकार बनाई। अपने कार्यकाल में मरांडी ने नए झारखंड के विकास के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए। इनमें से एक था सड़कों का विकास।
बाबुलाल मरांडी, babulal marandi, first cm jharkhand

 इसके अतिरिक्त शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने कई सराहनीय कदम उठाये जिसमें छात्राओं के लिए साइकिल की व्यवस्था, ग्राम शिक्षा समिति बनाकर स्थानीय विद्यालयों में ग्रामीणों द्वारा पारा शिक्षकों की बहाली, सभी गाँवों, पंचायतों और प्रखण्डों में आवश्यकतानुसार विद्यालयों का निर्माण तथा शिक्षकों की नियुक्ति प्रमुख था। राज्य में बिजली और पानी की उचित व्यवस्था, रोजगार, लघु उधोग तथा कृषि के विकास के लिए कई योजनाओं की शुरुआत की। जनता को विश्वास होने लगा था झारखण्ड राज्य विकास की ओर अग्रसित हो रहा है लेकिन 2003 में झारखंड में डोमिसाइल लागू कर झारखंड वासियों की पहचान सुनिश्चित करने का उनका निर्णय आत्मघाती साबित हुवा। उनके इस विचार से केंद्र की सरकार में शामिल सहयोगी पार्टी जदयू के दबाव में भाजपा को बाबूलाल मरांडी को अपदस्थ कर अर्जुन मुंडा को झारखंड का नया मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। अपदस्थ होने के बाद मरांडी पार्टी में उपेक्षित महसूस करने लगे थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार झेलनी पड़ी हालांकि मरांडी कोडरमा सीट से चुनाव जितने में सफल रहे, जबकि केंद्रीय कैबिनेट मंत्री यशवंत सिन्हा जैसे कई शीर्ष नेता हार गए।

झारखंड विकास मोर्चा 

मुख्यमंत्री पद से अपदस्थ होने के बाद धीरे-धीरे उनका भारतीय जनता पार्टी से मतभेद बढ़ता गया और परिणामस्वरूप बाबूलाल मरांडी ने 2006 में कोडरमा लोकसभा सीट और भाजपा की सदस्‍यता से इस्तीफा दे दिया और 24 सितम्बर 2006 को झारखंड के हजारीबाग में झारखंड विकास मोर्चा(प्रजातांत्रिक) नाम से नई राजनीतिक पार्टी की घोषणा की, जिसमें बीजेपी के 5 विधायक भी पार्टी छोड़कर शामिल हुए। 2006 में कोडरमा लोकसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में खड़े हुए और पुनः सांसद निर्वाचित हुए। 2009 के लोकसभा चुनाव में वह कोडरमा लोकसभा सीट से अपनी नई पार्टी जेवीएम के टिकट से चुनाव लड़े और फिर संसद पहुंचे। 2009 झारखंड विधानसभा चुनाव में जेवीएम ने 11 सीटें जीती,  2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव में 8 सीटें, लेकिन 11 फरवरी 2015 को जेवीएम के 6 विधायक नवीन जायसवाल(हटिया), अमर कुमार बाउरी (चंदनकियारी), गणेश गंजु(सिमरिया), जानकी यादव(बरकट्ठा), रणधीर सिंह (सारठ) और आलोक कुमार चौरसिया (डाल्टेनगंज) के भाजपा में शामिल हो जाने से जेवीएम के 2 विधायक शेष रह गए। हाल हीं में संपन्न हुवे 2019  विधानसभा चुनाव में जेवीएम 3 सीटें हीं जीत सके।
बाबुलाल मरांडी, babulal marandi, first cm jharkhand


     बाबूलाल मरांडी 2014 तथा 2019 में फिर कोडरमा लोकसभा से हीं चुनाव लड़े लेकिन क्रमश रविन्द्र कुमार राय और अन्नपूर्णा देवी से हार गए। मरांडी जी अपने जीवन काल में 5 बार लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए जिसमे 3 बार कोडरमा लोकसभा तथा 2 बार दुमका लोकसभा क्षेत्र शामिल है। 
बाबुलाल मरांडी, babulal marandi, first cm jharkhand

श्री मरांडी वर्तमान में 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव में धनवार विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुए हैं। पिछले कुछ सप्ताह में उनका झुकाव भाजपा की ओर बढ़ा है, सम्भवतः फरवरी में वो भाजपा में जेवीएम का विलय कर बीजेपी में खुद सामिल हो सकते हैं। फिलहाल 14 वर्ष बाद पुनः भाजपा में शामिल होने तथा जेवीएम का भाजपा में विलय करने की खबर को लेकर चर्चा में हैं।


इसे भी पढ़ें...

बाबुलाल मरांडी और भाजपा : कौन किनके खेवनहार


Sunday, 8 December 2019

हलधर नाग: पद्मश्री से सम्मानित मात्र तीसरी पास कोसली भाषा के महान कवि


मात्र तीसरी पास महान कवि पद्मश्री हलधर नाग के जीवन संघर्ष की कहानी

'लोककवि रत्न' के उपनाम से साहित्य की दुनियां में प्रसिद्ध कोशली भाषा के महान कवि पद्मश्री हलधर नाग जी के जीवन संघर्ष की कहानी।  
www.antyodaybharat.com
हलधर नाग

हलधर नाग का जीवन संघर्ष

दुनियां में कुछ लोग जीवन में आने वाले छोटी-छोटी बाधाओं और असफलताओं से घबरा जाते है, हतोत्साहित हो जाते हैं, परिस्थितियों से हार मान लेते हैं और जीवन को प्रभावित कर बैठते है।
          वहीं कुछ दृढ़ निश्चयी, सफलता की अभीप्सु तथा अटूट आत्मविश्वास वाले लोग हैं जिन्हें न उनकी असफलता हरा पाती है और न हीं बुरे हालात और परिस्थितियाँ उन्हें उनके कर्मपथ से डिगा पाती है।
    एक ऐसे हीं व्यक्ति की यह असाधारण कहानी है, जो सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के वावजूद सफलता की उचाईयों को छुवे है। ये कहानी है उड़ीसा के कोशली भाषा के महान कवि और लेखक श्री हलधर नाग जी की, जिन्होंने साबित किया है की यदि दृढ़ निश्चय हो तो दुनियां में कुछ भी नामुमकिन नहीं।

हलधर नाग जीवन परिचय

         श्री हलधर नाग जी का जन्म 31 मार्च 1950 को ओड़ीसा के बरगढ़ जिला के घेंस गांव में एक बेहद गरीब परिवार में हुआ था। जब ये मात्र 10 वर्ष के थे तो उनके पिता का देहांत हो गया। श्री नाग मात्र तीसरी कक्षा तक की औपचारिक शिक्षा ले सके क्योंकि पिता की मृत्यु के बाद घर की दयनीय स्थिति को देखकर इन्हें बीच मे ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी, घर के खर्चे के लिए इन्हें दो साल तक पास के होटल में बर्तन धोने का काम करना पड़ा, फिर गाँव के प्रमुख के मदद से एक उच्च विद्यालय के होस्टल में रसोइया का काम मिल गया जहाँ उन्होंने 16 वर्षों तक काम किया, स्कूल में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि उनके गाँव में बहुत सारे स्कूल खुल रहे हैं फिर श्री नाग एक बैंक से 1,000 रुपए लोन लेकर स्‍कूली बच्‍चों के लिए स्‍टेशनरी और खाने-पीने के दूसरे सामानों वाली एक छोटी दुकान खोल ली।

www.antyodaybharat.com
हलधर नाग

   हलधर नाग का साहित्यिक जीवन
          

     श्री नाग बचपन से ही लोक साहित्य और लोक गीतों में रुचि रखते थे, कोशली में लोक कथाएँ लिखने वाले नाग ने 1990 में अपनी पहली कविता लिखी। जब उनकी कविता ‘धोडो बरगाछ’ (पुराना बरगद का पेड़) एक स्थानीय पत्रिका में प्रकाशित हुई, तो इसके बाद उन्होंने चार और कवितायेँ भेज दी और वो सभी प्रकाशित हो गए। इससे कविता लेखन के प्रति उनका झुकाव बढ़ता गया, आस-पास के गांवों का दौरा कर अपनी कविताओं को सुनाने लगे लोग उन्हें सम्मानित करने लगे जिससे उनका प्रोत्साहन बढ़ता गया, उनकी कविताओं को आलोचकों और प्रशंसकों से सराहना मिलने लगी। यहीं से उन्हेंलोक कवि रत्ननाम से जाना जाने लगा और इसके बाद उन्होंने दुबारा पीछे मुड़कर नहीं देखा।
           हलधर नाग को अपनी सारी कविताएं और अब तक उनके लिखे 20 महाकाव्य कंठस्थ हैं। श्रीनाग की कोसली भाषा की कविता संबलपुर विश्वविद्यालय के पाँच विद्वानों के पीएचडी अनुसंधान का विषय रहा है। संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा उनके लेखन के संग्रह 'हलधर ग्रंथावली-2' को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। 

हलधर नाग की कुछ कवितायें और महाकाव्य

हलधर ग्रन्थावली -१
हलधर ग्रन्थावली -२
सम्पर्द
कृष्णगुरु
लोकगीत
अछिया
बछर
महासती उर्मिला
प्रेम पाइछन
तारा मन्दोदरी
करमसानी
रसिया कवि
शिरी समलाइ
बीर सुरेन्द्र साइ

        उनकी कवितायें और महाकाव्य सामाजिक मुद्दों और हालात के बारे में बात करती है, उत्पीड़न, धर्म, प्रकृति और पौराणिक कथाओं से लड़ती है, जो उनके आस-पास के दैनिक जीवन से ली गई हैं।
                श्री नाग का मानना है की कविताओं में वास्तविक जीवन से जुड़ाव और लोगों के लिए एक संदेश होना चाहिए। उनका मानना है की हर कोई एक कवि है, पर कुछ ही लोगों के पास उन्हें आकार देने की कला होती है। दिन-प्रतिदिन युवाओं के कोसली भाषा की कविताओं और महाकाव्यों के प्रति बढ़ती रुचि को देखकर उन्हें अच्छा लगता है।

www.antyodaybharat.com
पद्मश्री पुरुस्कार ग्रहण करते श्री नाग
   
सादा जीवन उच्च विचार के आदर्श को अपनाने वाले श्री नाग हमेशा मात्र एक सफेद धोती-बनियान पहनते है और नंगे पैर चलते है। श्री नाग को उड़िया साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्हें उनके कोसली भाषा साहित्य में असाधारण योगदान के लिए 2019 में संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया है।

हलधर नाग जी के जीवन से सीख

       उनका जीवन संघर्ष हमें प्रेरणा देती है की कठिन परिश्रम और दृढ़ निश्चय से नामुमकिन को भी मुमकिन किया जा सकता है। दुनिया का हर व्यक्ति जीवन में सफलता की उम्मीद करता हैं इसके लिए वो अथक प्रयास भी करता है। कई बार कुछ अलग करने की चाह और प्रबल प्रेरणा से व्यक्ति अपने मुकाम के करीब पहुँच भी जाता है लेकिन कुछ कठिन संघर्ष को सामने देख सफलता से वंचित हो जाता है।
        श्री नाग का जीवन संघर्ष, जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव कराता है, सतत सक्रिय रहना सिखाता है, जीवन के कई रंग दिखाता है, कठिनाइयों से पार पाना सिखाता है, अनुभवी बनाता है, समय की कीमत सिखाता है जिससे प्रेरित होकर हम दृढ़ विश्वास के साथ फिर से अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हो सकें। हमें सिख देता है की जीवन 'संघर्ष' का दूसरा नाम हैं, जीवन का सबसे बड़ा वरदान है, वो हमें सहनशील, संवेदनशील और देवतुल्य बनाता हैं और सबसे जरूरी जमीन से जुड़े रहना सिखाता है। 
             श्री नाग को एक सूत्र से परिभाषित करने की कोशिश करें तो वो सूत्र इस प्रकार का हो सकता है।
             दृढ़ इच्छाशक्ति + दृढ़ विश्वास + दृढ़ संकल्प + स्थिरता + कड़ी मेहनत = हलधर नाग
             


https://www.jantantra.net/?m=1






आप  facebook और twitter के माध्यम से भी अंत्योदय भारत से  जुड़ सकते हैं।