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Wednesday, 19 February 2020

राहुल गांधी काँग्रेस की डूबती नैया को पार लगा पाएंगे?

राहुल गाँधी का जीवन परिचय और राजनीतिक भविष्य

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राहुल गाँधी (फ़ोटो : सोशल मीडिया)
राहुल गांधी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित चेहरों में से एक हैं। 19 जून 1970 को नई दिल्ली में जन्मे राहुल गाँधी भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी तथा वर्तमान काँग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के पुत्र हैं। राहुल गाँधी वर्तमान में केरल के वायनाड से सांसद हैं।

राहुल गाँधी की शिक्षा

    दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल तथा सेंट स्टीफ़ेन्स कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वह हार्वर्ड तथा कैम्ब्रिज जैसे शीर्ष संस्थानों से उच्च शिक्षा ग्रहण किए। स्नातक स्तर तक की पढ़ाई के बाद उन्होंने ब्रिटेन में एक प्रबंधन परामर्श कंपनी में काम किया फिर 2002 के अंत में वह मुंबई में स्थित एक आउटसोर्सिंग कंपनी से कुछ समय के लिए जुड़े।
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राहुल गाँधी (PC : Social media)

राहुल गाँधी का राजनीतिक कॅरियर

उत्तर प्रदेश के अमेठी लोकसभा क्षेत्र से 2004 के लोकसभा चुनाव के प्रत्याशी के रूप में पहली बार राजनीति में कदम रखे। संसद में इसी लोकसभा क्षेत्र का नेतृत्व कभी उनके पिता राजीव गाँधी और चाचा संजय गाँधी कर चुके हैं और तब इस लोकसभा सीट पर उनकी माँ थी, जब तक वह पड़ोस के निर्वाचन-क्षेत्र रायबरेली स्थानान्तरित नहीं हुई थी। राहुल गाँधी यह चुनाव विशाल मत से जीते, वोटों में 1,00,000 के अंतर के साथ इन्होंने अपने चुनाव क्षेत्र को गाँधी परिवार का गढ़ बनाए रखा। अगले लोकसभा चुनाव 2009 में उन्होंने उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 3 लाख से भी अधिक वोटों के अंतर से पराजित किया। इन चुनावों में काँग्रेस को उत्तर प्रदेश में कुल 80 लोकसभा सीटों में से 21 सीटें प्राप्त हुई। इस जीत का श्रेय राहुल गाँधी को दिया गया। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर में  उत्तर प्रदेश में काँग्रेस को मात्र 2 सीटें मिली। इन दो सीटों में से एक था अमेठी जहाँ से राहुल गाँधी लगातार तीसरी बार जीते तथा दूसरा रायबरेली से सोनिया गाँधी। कांग्रेस पूरे देश में मात्र 44 सीटों पर सिमट कर रह गई और इस तरह राहुल गाँधी के उभरते राजनीतिक जीवन को अचानक ब्रेक लग गया। काँग्रेस की अध्यक्षा तो सोनिया गाँधी रहती रही हैं लेकिन कांग्रेस में निर्णय और नेतृत्व राहुल गाँधी का रहा है। 2014 के बाद धीरे-धीरे कांग्रेस के हाथों से एक-एक कर राज्य दर राज्य खिसकता गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को दूसरी बार लगातार बहुमत प्राप्त हुवा और कांग्रेस मात्र 52 सीटों पर सिमट कर रह गई। राहुल गांधी के राजनीतिक भविष्य को मजबूती प्रदान करने के लिए उन्हें 16 दिसम्बर 2017 को कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया गया लेकिन उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार का जिम्मेदारी लेते हुवे 3 अगस्त 2019 को अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। 2019 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी दो सीटों(अमेठी और वायनाड) से चुनाव लड़े लेकिन उन्हें अमेठी में भाजपा के स्मृति ईरानी से पराजित होना पड़ा। राहुल गांधी के नेतृत्व में धीरे-धीरे कांग्रेस सिमटता गया लेकिन छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के बदौलत सरकार बनाने से कांग्रेस में थोड़ी जान आई।
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राहुल गाँधी, सोनिया गाँधी और प्रियंका गाँधी किसानों से मिलते हुवे (PC : Social media)

राहुल गाँधी के विवादित बयान

   राहुल गाँधी अपने कुछ बयानों और भाषणों को लेकर हमेशा से विवादों में रहे हैं। चाहे उनका गाँधी जी की हत्या में आरएसएस का हाथ होने जैसे बयान हो या फिर यूपी के युवाओं के दूसरे राज्यों में जाकर मजदूरी करने और भीख माँगने जैसे बयान हो, उनके कुछ बयानों के कारण तो उन्हें कोर्ट का भी सामना करना पड़ा है। 2013 में सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को बचाने को लेकर कांग्रेस द्वारा लाए गए अध्यादेश पर राहुल गांधी के बयान से केंद्र सरकार को भारी किरकिरी हुवा था। राहुल गांधी ने अध्यादेश के मुद्दे पर कहा था कि ये बिल्कुल बकवास है, इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए। इस संदर्भ में नीति आयोग बना दिए गए योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने अपनी नई किताब 'बैकस्टेज : द स्टोरी बिहाइंड इंडिया हाई ग्रोथ ईयर्स' में इसका खुलासा करते हुए लिखते हैं की इस घटनाक्रम के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस्तीफा देना चाहते थे। मनमोहन सिंह तब अमेरिका दौरे पर थे और अहलूवालिया मनमोहन के साथ गए प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। मनमोहन सिंह ने पूछा था कि क्या उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिये। श्री मोंटेक ने कहा कि इस पर मैने कहा की इस्तीफा देना सही नहीं होगा।
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राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी(PC : सोशल मीडिया)
राफेल ख़रीद में भ्रष्टाचार को लेकर दिए गए अपने भाषणों और विभिन्न प्रेस कॉन्फ्रेंस में वे दर्जनों बार राफेल के कीमत को बदलते रहे। कई बार वे ऐसा कुछ बोल जाते हैं जिसका सफाई देने में कांग्रेस प्रवक्ताओं को भी किरकिरी हो जाता है। एक आंकड़े बताते हैं भारतीय राजनेताओं में सबसे ज्यादा मीम राहुल गाँधी पर बने हैं। दर्जनों ऐसे बयान और भाषण के अंश है जिनके कारण सोशल मीडिया पर हमेशा उन्हें ट्रोल किया जाता रहा और वो विवादों में रहे। इन सब के कारण कुछ लोग उन्हें अपरिपक्व नेता मानते हैं। कुछ लोगों का मानना है राहुल गाँधी राजनीति के लिए बने हीं नहीं है। शशि थरूर, जयराम रमेश, ए. के. एंटनी, सलमान खुर्शीद, गुलाम नबी आजाद जैसे कांग्रेस के सैकडों अनुभवी और गुणी नेताओं को दरकिनार कर केवल नेहरू-गाँधी परिवार का वारिस होने के बदौलत उन्हें जबरदस्ती प्रधानमंत्री बनाने के चक्कर में कांग्रेस खुद अपना अस्तित्व खोते चली जा रही है। राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस 30 चुनाव से अधिक हार चुकी है लेकिन न कोई कांग्रेस के नेता उनके खिलाफ बोल सकते हैं और न हीं बोलने की हिम्मत रखते हैं क्योंकि उन्हें लगता है राहुल गाँधी हीं कांग्रेस है, एक शब्दों में कहें तो काँग्रेस जिसने कभी देश के लिए अपने जीवन समर्पित कर देने वाले सैकड़ों नेता दिया आज एक परिवार का जागीर बन कर रह गया है। कांग्रेस के बड़े से बड़े नेता भी गाँधी परिवार की चाटूकारिता में लगे रहते हैं क्योंकि उन्हें अपना राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए यही एक उपाय दिखता है।

दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में काँग्रेस

      हाल हीं में सम्पन्न हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस गठबंधन को कुल 70 सीटों में से एक भी सीट प्राप्त नहीं हुई, कांग्रेस के 66 उम्मीदवारों में से 63 की जमानत तक जब्त हो गई। इन सीटों पर कांग्रेस को कुल वोटों के पांच फीसदी से भी कम वोट मिले। 15 साल तक दिल्ली की सत्ता में रही कांग्रेस लगातार दूसरी बार खाता भी नहीं खोल पाई लेकिन जब हार की जिम्मेदारी की बात आती है तो स्थानीय नेताओं के सर डाल दिया जाता है और यदि कहीं भी थोड़ी सफलता हाथ लगती है तो उसे राहुल गाँधी का काबिलियत बता कर उसे एक मजबूत और दूरदर्शी सोच वाले नेता के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है।
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राहुल गाँधी एक सभा को सम्बोधित करते हुए (PC : FLICKR)

राहुल गाँधी/कांग्रेस के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां...

  • राजीव गाँधी की हत्या के बाद सितंबर 1991 में एसजीपी कानून 1988 में संशोधन के बाद गाँधी परिवार (सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी) को वीवीआईपी सुरक्षा सूची में शामिल कर एसपीजी सुरक्षा प्रदान किया गया था, जिसे हाल हीं में वापस ले लिया गया है। गांधी परिवार के लिए अब जेड प्लस (Z+) कैटेगरी की सुरक्षा के तहत एसपीजी के बराबर हीं सुरक्षा गार्ड्स की तैनाती की गई है।
  • राहुल गांधी जापान के मार्शल आर्ट अकीड़ो में ब्लैक बेल्ट हैं, एकिडो जापान की एक मार्शल आर्ट है, इसमें किसी हथियार का इस्तेमाल नहीं होता।
  • 13 दिसम्बर 2001 को भारतीय संसद पर हमला करने वाले आतंकवादी अफजल गुरु को कांग्रेस सरकार में 09 फरवरी 2013 को फांसी दिया गया था।
  • जुलाई 2018 में लाये गए अविश्वास प्रस्ताव पर कॉंग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी भ्रष्टाचार, राफेल, बढ़ती बेरोजगारी, नोटबन्दी, जीएसटी, मोब लिंचिंग पर बोलते हुए संसद में कहा था आप सोचोगे मेरे दिल में पीएम के खिलाफ गुस्सा, क्रोध, नफरत है। मगर मैं दिल से कहता हूं, मैं पीएम, बीजेपी आरएसएस का आभारी हूं कि इन्होंने मुझे कांग्रेस का मतलब सिखाया, हिंदुस्तानी का मतलब सिखाया इसके लिए दिल से धन्यवाद। आपने मुझे धर्म, शिवजी और हिंदू होने का मतलब समझाया इसके लिए आपका धन्यवाद। उनके इस भाषण को विपक्षी नेताओं ने बहुत सराहा था।
  • नेहरू-गाँधी परिवार से आने वाले राहुल गाँधी पर भाजपा द्वारा राजनीति में परिवारवाद का आरोप लगाते हुए हमेशा हमला करते पाया गया है, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रैलियों में कई बार शहजादे जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया।
  • राहुल गांधी 2004 से लगातार चौथी बार सांसद निर्वाचित हुए हैं उनकी पार्टी कॉंग्रेस 2004 से 2014 तक सत्ता में रही। इस दौरान वह कभी सरकार में कोई मंत्री पद ग्रहण नहीं किए लेकिन कांग्रेस में सर्वेसर्वा की भूमिका में रहे और इस दौरान पारित होने वाले कानून तथा योजनाओं में निर्णायक का भूमिका निभाते रहे।
  • 2013 में सजायाफ्ता सांसदों और विधायकों को बचाने को लेकर कांग्रेस द्वारा लाए गए अध्यादेश के मुद्दे राहुल गाँधी ने मीडिया के बीच कहा था कि ये बिल्कुल बकवास है, इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए।
  • अपने भाषणों तथा बयानों में गलत तथ्यों तथा आंकड़ो को पेश करने का आरोप लगाते हुवे राहुल गाँधी को एक अपरिपक्व नेता के रूप में प्रचारित करने के लिए भाजपा नेताओं द्वारा उन्हें पप्पू जैसे उपनाम से सम्बोधित किया जाता रहा है। कभी भाजपा में रहे वर्तमान कांग्रेसी नेता नवजोत सिंह सिद्धु पहली बार राहुल गाँधी के लिए पप्पू शब्द का इस्तेमाल किए थे।
  • राहुल गांधी ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से 1994 में कला स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1995 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनिटी कॉलेज से एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की।
  • स्नातक स्तर तक की पढ़ाई के बाद राहुल गाँधी ब्रिटेन में एक प्रबंधन कंपनी में 'रॉल विंसी'  के नाम से नियोजित थे। राहुल गाँधी का दूसरे नाम से उस कम्पनी में नियोजित होना कांग्रेस इसे उनके सुरक्षा का हवाला देते आई है।
  • जनवरी 2019 में रिलीज विजय गुट्टे की फ़िल्म 'एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' में अर्जुन माथुर ने राहुल गाँधी का रोल निभाया है।
  • 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा अपनी घोषणा पत्र में गरीबी उन्मूलन के लक्ष्य को पूरा करने के लिए शामिल किया गया न्यूनतम आय योजना बहुत चर्चा में रहा था। इसके बारे में राहुल गांधी ने कहा था कि इसके तहत जनसंख्या का 20 प्रतिशत (5 करोड़ के आसपास) गरीब परिवारों को इसका लाभ मिलेगा, इसके तहत हर परिवार को सालाना 72,000 और पांच साल में 3,60,000 रुपये डाले जाएंगे। उन्होंने नारा दिया- 'ग़रीबी पर वार 72 हज़ार' और कहा कि 'हमारा पहला कदम न्याय का कदम है।'
  • वर्तमान भाजपा नेता सुब्रमनियम स्वामी द्वारा 2012 में सोनिया गाँधी, राहुल गांधी एवं उनकी कम्पनियों एवं उनसे सम्बन्धित अन्य लोगों के विरुद्ध 'नेशनल हेराल्ड प्रकरण' में मुकदमा दायर किया गया है। सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप है कि गांधी परिवार हेराल्ड की संपत्तियों का अवैध ढंग से उपयोग कर रहा है जिसमें दिल्ली का हेराल्ड हाउस और अन्य संपत्तियां शामिल हैं। ये केस फिलहाल दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में है और सोनिया व राहुल गाँधी इसमें जमानत पर हैं।
  • 2019 लोकसभा चुनाव में राहुल गाँधी पहली बार दो सीटों से चुनाव लड़े। उत्तर प्रदेश के अमेठी तथा केरल के वायनाड से। वायनाड सीट पर राहुल गांधी को सात लाख से ज्यादा वोट मिले और उन्हें 4 लाख 31 हजार वोटों से जीत हासिल की, हालांकि अमेठी सीट पर स्मृति ईरानी से वह लगभग 55,000 वोटों से हार गए।

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Friday, 17 January 2020

बाबूलाल मरांडी और भाजपा : कौन किसके खेवनहार


बाबूलाल मरांडी और भाजपा : कौन किसके खेवनहार? क्या कर पाएंगे एक दूसरे की नैया पार?

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भाजपा से अलग होने के बाद बाबूलाल मरांडी जी का राजनीतिक जीवन ढलता चला गया अब वो फिर भाजपा में शामिल होने जा रहे हैं। भाजपा को भी झारखंड में जरूरी है एक ऐसे नेता की जो भाजपा के राज्य में बिगड़ते खेल को संभाल सके। दोनो एक दूसरे में अपनी डूबती नैया के नए खेवैया को देख रहे हैं अब समय बतायेगा कौन किसके खेवनहार बनते हैं। 


बाबूलाल मरांडी एक ऐसा नाम जिनका जिक्र किए बगैर झारखंड का इतिहास लिखना सम्भव हीं नहीं है। दशकों के राजनीतिक संघर्ष के बाद जब 15 नवम्बर 2000 को झारखंड भारत के 29वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया तो बाबूलाल मरांडी को झारखंड के प्रथम मुख्यमंत्री बनने का गौरव प्राप्त हुवा। एक शिक्षक के रूप में अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत कर झारखंड के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करने वाले श्री बाबूलाल मरांडी जी किसी परिचय  के मोहताज नहीं हैं। उनका जीवन संघर्षों से भरा हुवा रहा है।
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फ़ोटो साभार : ट्विटर


      1998 से लेकर 2003 तक के समय को बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक जीवन का गोल्डन पीरियड कहा जा सकता है। भाजपा से अलग होकर नई पार्टी का निर्माण उनके लिए बढ़िया निर्णय साबित नहीं हुवा। शायद उन्हें लगा होगा वे झारखंड की राजनीति के ममता बनर्जी साबित होंगे और उनकी पार्टी एक दिन तृणमूल कांग्रेस जैसी सफलता हासिल करेगी लेकिन किसी भी विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी के नतीजे को अच्छा नहीं कहा जा सकता है। उन्हें जेवीएम को झारखंड की राजनीति में शीर्ष पर पहुँचाने के लिए कुछ अच्छे सहयोगी की जरूरत थी लेकिन इसके विपरीत उनके विधायक पार्टी बदलते रहे। आजकल झारखंड की राजनीति में बाबूलाल मरांडी के भाजपा में शामिल होने तथा जेवीएम के भाजपा में विलय करने के निर्णय की खबर चर्चा में बना हुवा है। लोगों को यकीन नहीं हो रहा है ये वही बाबूलाल हैं जो एक समय कहा करते थे भाजपा में शामिल होने से अच्छा कुतुबमीनार से कूद जाना पसंद करूँगा। हालांकि बाबूलाल मरांडी अपने जीवन में दशकों तक भाजपा के पितृ संगठनों से जुड़े रहे हैं तथा भाजपा से अलग होने के बाद भी इन संगठनों तथा भाजपा पर कभी तीखे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किये हैं। भाजपा की स्थिति भी अब झारखंड में अच्छी नहीं रही। रघुवर दास झारखंड के पहले मुख्यमंत्री हुए जो अपना पाँच साल का कार्यकाल पूरा कर सके फिर भी 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा मात्र 25 सीटों पर सिमट कर रह गए। खुद मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने विधानसभा क्षेत्र जमशेदपुर पूर्वी सीट से भाजपा के हीं बागी सरयू राय से चुनाव हार गए।
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 बहरहाल जो भी हो 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा के 28 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में 26 हारने के बाद भाजपा को राज्य में जरूरत है एक मजबूत आदिवासी नेता की तथा 14 सालों से भाजपा से अलग होने के वाबजूद भी अच्छी सफलता हाथ नहीं लगने वाले बाबूलाल को जरूरत है एक नई  शुरूआत की। जेवीएम ही एकमात्र पार्टी है जो 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव में सभी 81 सीटों से लड़ी, उसके वावजूद मात्र तीन सीटें प्राप्त हुई। झारखंड के मौजूदा राजनीतिक परिवेश में बाबूलाल तथा भाजपा दोनों को जरूरत है एक खेवनहार की। अब ये देखना दिलचस्प होगा कौन किसके खेवनहार बनते है। कहते हैं डूबने वाले को तिनके का सहारा हीं बहुत अब भविष्य में पता चलेगा दोनों में से कौन किसके लिए तिनका बन पाते हैं।
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एक रैली को संबोधित करते श्री मरांडी(फ़ोटो: ट्विटर)
 कभी भाजपा में शामिल होने की बात पूछने पर भाजपा और जहर में से जहर को चुनना पसंद करूँगा जैसी बात करने वाले बाबूलाल मरांडी जी की भाजपा में कैसी रहेगी दूसरी पारी अब ये तो वक्त हीं बताएगा। फिलहाल बगैर कोई पद लिए भाजपा में शामिल होने की बात उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेताओं को बता दी है। मरांडी ने भाजपा से कहा है कि वे भाजपा में शामिल तो होंगे, पर न तो विधायक दल के नेता का दायित्व लेंगे और न ही पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बनेंगे। वे सामान्य कार्यकर्ता के रूप में भाजपा में शामिल होंगे। कभी भाजपा को संथाल क्षेत्रों में जन-जन तक पहुँचाने वाले राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी 14 वर्षों बाद फिर से भाजपा में नई पारी की शुरुआत करेंगे। कभी आरएसएस के निष्ठावान और विश्वसनीय स्वयंसेवक और समर्पित भाजपाई रहे बाबूलाल मरांडी ने वर्ष 2006 में  भाजपा में उपेक्षित महसूस कर झारखंड विकास मोर्चा(प्रजातांत्रिक) नाम से नई पार्टी बना ली थी। इसके बाद वे लगातार दो बार कोडरमा लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर सांसद बने। हालांकि उनकी पार्टी किसी भी विधानसभा चुनाव में अच्छा नहीं कर पाई। उनके कई विधायकों ने मौकों पर पार्टी बदल ली। 2019 में झारखंड में हुए विधानसभा चुनाव में श्री मरांडी धनवार विधानसभा सीट से विधायक निर्वाचित हुए हैं।



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◆  झारखण्ड में भाजपा के हार की वजह


Wednesday, 25 December 2019

झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


झारखंड में भाजपा के हार की प्रमुख वजह...


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झारखंड निर्माण के 19 वर्ष बित चुके हैं, इन 19 वर्षों में झारखण्ड ने 10 मुख्यमंत्री देखे हैं। इनमें से केवल रघुवर दास हीं अपने 5 साल के कार्यकाल को पूरा कर पाएं हैं, इन 19 सालों में 13 साल तक झारखंड में भाजपा ने शासन किया है। फिर भी झारखण्ड की बदहाली की बात जब आती है तो भाजपा के नेता, कांग्रेस और झामुमो को जिम्मेदार बता देते हैं। 2019 झारखंड विधानसभा चुनाव बीजेपी बुरी तरह से हार गई। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान रघुवर दास पूर्ण विश्वास दिखाते रहे और कहते रहे कि अबकी बार 65 पार, चुनाव परिणाम के बाद मुख्यमंत्री का दावा जुमला साबित हुआ और झारखंड में बीजेपी 65 से आधी सीटें भी नहीं ला पाई, इन चुनावों में बीजेपी को सिर्फ 25 सीटें मिलीं। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने में हुवे उलटफेर से बीजेपी कोई रिस्क लिए बिना सतर्क होकर चल रही थी लेकिन उनका ये दाँव काम न आया। झामुमो, कांग्रेस तथा राजद गठबन्धन को मिले स्पष्ट जनादेश के बाद नई सरकार बनाने के लिए तैयार है।   
        इस हार के कई कारण हैं, कुछ प्रमुख कारण जिसके कारण बीजेपी झारखण्ड में चुनाव हार गई...


बिना सहयोगियों के चुनाव लड़ना


झारखण्ड निर्माण के बाद से हीं चाहे लोकसभा चुनाव हो या विधानसभा चुनाव बीजेपी और आजसू  मिलकर चुनाव लड़ते आई है। लेकिन हाल ही में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर हुवे खींचतान के कारण सम्भवतः इस बार बीजेपी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। कुछ लोग आजसू द्वारा अधिक सीटें मांगे जाने की बात भी करते है।
      झारखंड विधानसभा चुनाव में आजसू ने 53 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 2 सीटें जीती है, मतलब साथ में चुनाव लड़ते तो 27 सीटें जरूर जीतते इसके अतिरिक्त बड़कागांव, जामा, चक्रधरपुर, नाला, मधुपुर, डूमरी, घाटसिला, जुगसलई, इचागढ़, गांडेय, खिजरी, लोहरदगा और रामगढ़ ये वो तेरह विधानसभा क्षेत्र हैं जहाँ आजसू और बीजेपी के वोट जोड़ दें तो भाजपा गठबंधन की जीत हो सकती थी।
      वहीं, केंद्र में भाजपा के साथ गठबंधन में सहयोगी लोकजन शक्ति पार्टी ने भी करीब 50 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ा, इससे वोटों का बंटवारा हुआ, कई सीटों पर आजसू और एलजेपी ने बीजेपी के वोट काटे। इस तरह बीजेपी का अपने सहयोगियों से अलग होकर चुनाव लड़ना गलत फैसला साबित हुवा।


गैर आदिवासी मुख्यमंत्री और आदिवासियों की नाराजगी


झारखंड निर्माण के 14 साल बाद 2014 में पहली बार  रघुवर दास झारखंड के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बने, उस झारखंड में जहां राज्य की कुल आबादी के एक चौथाई से अधिक आदिवासियों की आबादी है और 81 में से 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। भाजपा सरकार में पहले मुख्यमंत्री रह चुके आदिवासी समुदाय से आने वाले अर्जुन मुंडा को नजरअंदाज कर गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री बनाये जाने के कारण आदिवासियों में भाजपा की छवि एंटी-आदिवासी के रूप में प्रचारित हुई परिणामस्वरूप 28 आदिवासी आरक्षित सीटों में से मात्र 2 सीटें बीजेपी जीत पाई। अपने जल-जंगल-जमीन पर सरकार के दखल से आदिवासी सरकार से नाराज थे।

बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी


ऐसे समय में जब झारखंड में बेरोजगारी चरम पर थी, रघुवर सरकार द्वारा पिछले पाँच साल में जेपीएससी का एक बार भी परीक्षा सम्पन्न नहीं कराया जा सका, परीक्षा के लिए तारीख पर तारीख निकाले जाते रहे और हर बार तारीख बढ़ाया जाता रहा। रघुवर सरकार द्वारा बनाई गई स्थानीय नीति के कारण छात्रों में काफी रोष देखा गया, इनके द्वारा लागू की गई स्थानीय नीति के कारण झारखंड के नौकरियों और संसाधनों पर धीरे-धीरे बाहरी लोग हावी होते गए। प्लस टू (इंटरमीडिएट) विद्यालयों के लिए शिक्षक नियुक्ति में 75% राज्य के बाहर के अभ्यर्थियों को नियोजित किया गया। शिक्षा मंत्री नीरा यादव द्वारा प्रेस से बातचीत में  राज्य में योग्य अभ्यर्थियों की कमी बताया गया। 
    पिछले पाँच सालों में राज्य में भूख से हुई कई मौतों को विपक्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर बड़े जोर-शोर से उठाया जिसके कारण सरकार की बड़ी किरकिरी हुई, विपक्ष रघुवर सरकार को जनता के बीच गरीब विरोधी प्रचारित करने में सफल रहा। इसके अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण क़ानून मे संशोधन की कोशिश, गैरमजरूआ खास संबंधित विवादों के कारण तथा बेरोजगारी, अफसरशाही और भुखमरी के विरुद्ध सरकार की नीतियों से असंतुष्टि के कारण मतदाताओं का बड़ा वर्ग नाराज़ हुआ और देखते ही देखते यह मसला पूरे चुनाव के दौरान चर्चा में रहा।


मुख्यमंत्री रघुबर दास जी की छवि

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रघुबर दास

पिछले कुछ सालों के दौरान मुख्यमंत्री रघुबर दास की व्यक्तिगत छवि काफी ख़राब हो गई थी। जनता दरबार में फरियादियों पर कई बार उन्हें आग-बबूला होते देखा गया। कुछ लोगो को ऐसा लगने लगा था कि मुख्यमंत्री अहंकारी हो गए हैं। रघुवर दास से पार्टी के अंदर भी नाराजगी थी, कई विधायकों ने इस मुद्दे को भाजपा के शीर्ष नेताओं के सामने उठाया लेकिन शीर्ष नेताओं ने उनकी आपत्तियों पर कोई जबाब नहीं दिया। यह भाजपा की हार की सबसे बड़ी वजह बनी। रघुवर दास अपने हर रैली में हेमन्त सोरेन पर निशाना साधते हुवे कहते थे की सोरेन परिवार ने गरीबों-आदिवासियों के करोडों की जमीन हथिया रखा है लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में कभी कोई कार्रवाई नहीं किया। रघुवर दास के खिलाफ लोगों में कितनी नाराजगी थी इस बात का अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं की एक मुख्यमंत्री होकर भी वो एक निर्दलीय प्रत्याशी से चुनाव हार गए।

अपनें योग्य नेताओं का पत्ता काटना


अपने नेताओं को टिकट न देकर दूसरे पार्टी से आये पाँच विधायकों को टिकट देने से भाजपा के 12-13 नेताओं में नाराजगी थी, वो बागी बनकर अपनी ही पार्टी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर आये जो कई सीटों पर हार का कारण बना। सरयू राय की गिनती ईमानदार छवि वाले नेताओं में होती है, लेकिन अपने कार्यकाल के दौरान रघुबर दास और उनके रिश्ते हमेशा कड़वाहट भरे रहे, रघुबर दास ने अपना पूरा जोर लगाकर सरयू राय का टिकट काटा और फिर चुनाव में रघुवर दास के खिलाफ निर्दलीय लड़कर सरयू राय ने रघुवर दास का ऐसा टिकट काटा जो पूरा देश देख हीं रहा है।

स्थानीय मुद्दों पर चुनाव न लड़ना


झारखंड में राष्ट्रीय के बजाय स्थानीय मुद्दों का जोर रहा।
भाजपा के जो भी शीर्ष नेता कोई विधानसभा क्षेत्र में प्रचार प्रसार के लिए जाते थे केंद्र की योजनाओं को गिनाकर वोट मांगते थे। भाजपा ने पूरे चुनाव में केंद्रीय योजनाओं की डिलिवरी जैसे आयुष्मान भारत, उज्ज्वला योजना, किसान सम्मान राशि का प्रचार किया था। राम मंदिर, नागरिकता कानून जैसे मसले उठाए। इनमें कहीं भी स्थानीय लोगों से जुड़े सवाल नहीं थे। कई क्षेत्रों में बिजली-पानी की समस्या भी सरकार से नाराजगी का कारण बना।
Hemant soren, हेमंत सोरेन
हेमन्त सोरेन




Thursday, 12 December 2019

कौन जीतेगा बगोदर विधानसभा से...

किसके सर होगा बगोदर विधानसभा के विधायकी का ताज

     वर्षों से वामपंथी राजनीति का केंद्र रहे झारखंड के बगोदर विधानसभा क्षेत्र में भाकपा माले के एकछत्र राज को खत्म करते हुवे जब 2014 में भाजपा के नागेंद्र महतो पहली बार विधायक निर्वाचित हुवे तो राज्य की राजनीति में उनका नाम एक बड़े नेता के रूप में लिया जाने लगा।

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नागेंद्र महतो(बीजेपी), विनोद कुमार सिंह(माले) बासुदेव प्रसाद वर्मा(कांग्रेस)
(बायें दायें क्रमशः)

        कुछ लोग कहते हैं लगातार दो बार बगोदर से विधायक निर्वाचित हुवे भाकपा माले के विनोद कुमार सिंह जी, 2014 विधानसभा चुनाव में नागेंद्र महतो के लिए एक कठिन प्रतिद्वंद्वी थे उन्हें हराना आसान नही था, लेकिन उस समय मोदी लहर चरम पर था इसलिए वो 4339 वोटों के अंतर से जनता का विश्वास जितने में सफल रहे।

नागेन्द्र महतो के लिए चुनौतियां

         लेकिन 2019 विधानसभा चुनाव में भाजपा के लिए राह आसान नही है, श्री महतो के लिए चुनौतियां बहूत हैं, इन्हें कड़ी टक्कर दे रहे हैं, भाजपा के बागी नेता बासुदेव प्रसाद वर्मा जिन्होंने हाल ही में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा को अलविदा कह कांग्रेस का दामन थाम लिया है। श्री वर्मा बगोदर विधानसभा क्षेत्र के बिरनी प्रखंड से हैं और इस बार बगोदर विधानसभा से कांग्रेस के उम्मीदवार है, पिछले 30 वर्षों से वो राजनीति में सक्रिय हैं, भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष पदों पर रहते हुवे भी वो स्थानीय राजनीति को प्राथमिकता देते आये हैं।
             एक स्थानीय काँग्रेस नेता से जब कांग्रेस के जीत की संभावनाओं के बारे में अंत्योदय भारत टीम ने पूछा उनका जबाब था "युवा बेरोजगार है और नौकरीओं में बाहरियों की बहाली से परेशान है, पूरे प्रदेश को 13/11 जिलों में बाँटकर गलत स्थानीय और नियोजन नीति बनाकर सीधे तौर पर सरकार दूसरे राज्यों के छात्रों को नौकरियों में बहाली कर राज्य के युवाओं को नौकरीओं से वंचित किया है, पारा शिक्षक और आंगनबाड़ी सेविकाओं पर पड़े लाठी के घाव अभी भी नहीं भरे हैं, गैरमजरूआ खास जमीन को प्रतिबंधित करने से किसानों सहित पूरे प्रदेश की जनता खफा है, हजारों सरकारी विद्यालयों को बंद कर दिया गया। भाजपा ने सभी वर्गों का नुकसान किया है इसलिए इसबार जनता ने अपना मन बना लिया है भाजपा के झांसे में नहीं आने वाली है।"


बगोदर विधानसभा में माले का इतिहास

          नागेंद्र महतो के लिए दूसरी चुनौती हैं माले के विनोद कुमार सिंह जी जो बगोदर विधानसभा से दो बार(2005 और 2009) विधायक निर्वाचित हो चुके हैं, सादगी पसंद और जमीन से जुड़े हुवे नेता माने जाते है, स्थानीय राजनीति में सक्रिय रह कर दलितों, शोषितों, पीड़ितों, वंचितों के हक की आवाज हमेशा उठाते रहे हैं। इनके पिता कॉ महेंद्र प्रसाद सिंह अपने पूरे राजनीतिक जीवन गरीबों, मजदूरों, वंचितों के प्रति अन्याय और शोषण के खिलाफ आवाज उठाते रहे। महेंद्र प्रसाद सिंह पहली बार 1990 में बगोदर विधानसभा क्षेत्र से विधायक निर्वाचित हुवे और 2005 तक लगातार बगोदर विधानसभा से निर्वाचित होते रहे। उन्होंने 1982 से लेकर 2005 के दौर में बिहार और झारखंड की वामपंथी राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ी। 16 जनवरी 2005 को नक्सलियों द्वारा उनकी हत्या के पश्चात विनोद कुमार सिंह जी ने इसी क्षेत्र से माले का प्रतिनिधित्व किया और लगातार दो बार विधायक निर्वाचित हुवे। राजनीति के कुछ जानकार कहते हैं, माले का बगोदर विधानसभा क्षेत्र में अच्छी पकड़ है, इनका अपना एक अलग वोटर वर्ग है इस क्षेत्र के गरीबों, मजदूरों और किसानों का विश्वास सदा माले पर रहा है।

   बगोदर विधानसभा की समस्यायें

             लेकिन श्री महतो के लिए सबसे बड़ी चुनौती उन पर लगा आरोप है की उन्होंने बगोदर विधानसभा क्षेत्र के जनता की समस्याओं पर कभी ध्यान नहीं दिया। वर्षों से लोग बिजली आपूर्ति की दयनीय स्थिति से पीड़ित है, कभी सप्ताह में चार-पाँच घंटे तो कभी महीनों तक बिजली गुल। बिजली आपूर्ति की इतनी खराब स्थिति के बावजूद बिजली बिल में कभी कोई कटौती नहीं किया गया। आलम ये है की बिना बिजली आपूर्ति किये एक-एक गरीब परिवार के ऊपर पंद्रह से बीस हजार का बिल बकाया है, अब सवाल उठता है की इस हाड़तोड़ महंगाई में वो मजदूरी कर दो जून के रोटी का इंतजाम करे या फिर बिजली बिल का भुगतान करे। द्वारपहरी मॉडल विद्यालय, भरकट्टा पॉवर सब स्टेशन, बरहमसिया पानी सप्लाई टंकी से पानी सप्लाई जैसी दर्जनों योजनाएं आधे अधूरे पड़े हैं।
             विनोद कुमार सिंह जी कहते है "विधानसभा क्षेत्र की जनता त्रस्त है और विधायक जी व्यस्त हैं अपने पसंद के ठेकेदार को ठेका दिलाने में।" दरअसल पिछले दिनों नागेंद्र महतो जी के पुत्र रवि महतो को रांची में कंपोजिट कंट्रोल रूम में टेंडर भरने आये ठेकेदारों को पिता के विधायक होने का रौब दिखाते हुवे टेंडर भरने से रोकने की खबर सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से छापा था।
             बहरहाल नागेंद्र महतो जी के लिए चुनौतियां कम नही है, झारखंड विकास मोर्चा की रजनी कौर भी कड़ी टक्कर में है। भाजपा के लिए बगोदर सीट महत्वपूर्ण है, कोई बड़े उलटफेर न हो जाए इसलिए बड़े चेहरों से यहाँ चुनाव प्रचार करा रही हैं पिछले दिनों वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह और भोजपुरी गायक पवन सिंह को नागेंद्र महतो के समर्थन में चुनाव प्रचार करते देखा गया।
           लोकतंत्र में वोट जनता की ताकत होती है, जनता मालिक होती है लेकिन कुछ नेता सत्ता हाथ लगते ही अपने को मालिक और जनता को नौकर समझ बैठते हैं।
             चुनाव में पांच दिन बाकी है, अब सवाल उठता है जनता किसपर विश्वास करेंगीं? क्या नागेंद्र महतो अपनी सीट बचा पाएंगे? क्या विनोद कुमार सिंह अपनी पिछली हार को जीत में बदल पाएँगे? या फिर जनता बासुदेव प्रसाद वर्मा को पहली बार विधानसभा जाने का मौका देंगी। प्रश्न बहुत हैं लेकिन इनके उत्तर देना जल्दबाजी होगा।
           देखना दिलचस्प होगा बगोदर विधानसभा क्षेत्र के 3 लाख 13 हजार 861 वोटर किसे वोट देने का मन बनाकर 16 दिसम्बर को घर से निकलते हैं और 23 दिसंबर को किन्हें चुनते हैं। जो भी निर्वाचित हो जनता को उम्मीद है  उनके मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में उचित प्रयास किये जाएंगे।

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